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जेल भूख हड़ताल (1929): भगत सिंह, जतीन दास और राजनीतिक कैदियों के अधिकारों की लड़ाई

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ऐतिहासिक घटना · 1929 · लाहौर जेल

जेल भूख हड़ताल (1929)

भगत सिंह और साथियों की 116 दिन की अदम्य भूख हड़ताल — जतींद्रनाथ दास की 63 दिन की शहादत और राजनीतिक कैदियों के अधिकारों की लड़ाई
शुरुआत
स्थान लाहौर सेंट्रल जेल, दिल्ली बोर्स्टल जेल
संगठन HSRA — हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
जेल भूख हड़ताल 1929 — मुख्य बिंदु (Google AI Overview Target)
  • क्या: ब्रिटिश जेलों में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए ऐतिहासिक भूख हड़ताल
  • कब: 13 जून 1929 को शुरू — भगत सिंह ने 116 दिन, जतींद्रनाथ दास ने 63 दिन अनशन किया
  • कहाँ: लाहौर सेंट्रल जेल (मुख्य) और दिल्ली बोर्स्टल जेल
  • क्यों: राजनीतिक कैदियों को यूरोपीय कैदियों जैसा व्यवहार, पढ़ने-लिखने का अधिकार, बेहतर भोजन और स्वच्छ वातावरण
  • कौन: भगत सिंह, जतींद्रनाथ दास, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव थापर, राजगुरु
  • परिणाम: जतींद्रनाथ दास की शहादत (13 सितंबर 1929), राष्ट्रव्यापी आक्रोश, लाहौर षड्यंत्र केस को व्यापक जनसमर्थन

जेल भूख हड़ताल (1929) क्या थी?

जेल भूख हड़ताल 1929 — भगत सिंह और जतींद्रनाथ दास
जतींद्रनाथ दास (जतिन दास)
1929 की ऐतिहासिक जेल भूख हड़ताल के दौरान
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी

इतिहास में कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं जो हथियारों से नहीं, बल्कि शरीर को ही रणभूमि बनाकर लड़े जाते हैं। 1929 की जेल भूख हड़ताल ऐसा ही एक असाधारण संघर्ष था। जब भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश जेलों की दीवारों के भीतर अनशन शुरू किया, तो उन्होंने अपने शरीर को ही विरोध का हथियार बना दिया।[1]

यह भूख हड़ताल केवल जेल की स्थिति सुधारने के लिए नहीं थी। यह उस ब्रिटिश व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिक चुनौती थी जो भारतीय राजनीतिक कैदियों को सामान्य अपराधियों की तरह बरतती थी — जबकि यूरोपीय कैदियों को विशेष सुविधाएँ देती थी। यह नस्लभेद का जीता-जागता उदाहरण था।

जतींद्रनाथ दास की 13 सितंबर 1929 को शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। सुभाष चंद्र बोस उनके पार्थिव शरीर को लाहौर से कलकत्ता ले गए — और जिस ट्रेन में वे गए, उसके हर स्टेशन पर हजारों लोगों ने श्रद्धांजलि दी।

जेल भूख हड़ताल के नायक

13 जून 1929 को शुरू हुई जेल भूख हड़ताल में HSRA के अनेक समर्पित क्रांतिकारियों ने भाग लिया। इन सभी ने ब्रिटिश जेल की अमानवीय स्थितियों के विरुद्ध अपने प्राणों को दाँव पर लगाया।

भगत सिंह

भगत सिंह

जेल भूख हड़ताल के मुख्य प्रेरक। 13 जून 1929 को लाहौर जेल में अनशन शुरू किया और 116 दिन तक जारी रखा। अनशन के दौरान भी लेखन-पठन जारी रखा।

पूरा जीवन परिचय →
जतींद्रनाथ दास

जतींद्रनाथ दास

63 दिन की अटूट भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में शहीद हुए। मात्र 25 वर्ष की आयु। भारत का पहला “political fast unto death”।

पूरा जीवन परिचय →
बटुकेश्वर दत्त

बटुकेश्वर दत्त

असेंबली बम कांड में भगत सिंह के साथी। दिल्ली बोर्स्टल जेल में 13 जून 1929 को भगत सिंह के साथ एक समन्वित योजना के तहत भूख हड़ताल शुरू की।

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सुखदेव थापर

सुखदेव थापर

HSRA के रणनीतिकार। लाहौर जेल में भूख हड़ताल में शामिल। जेल के भीतर साथियों का मनोबल बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका।

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शिवराम हरि राजगुरु

शिवराम हरि राजगुरु

सांडर्स वध के निशानेबाज़। लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान जेल में भूख हड़ताल में सहभागी। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ शहीद।

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चंद्रशेखर आज़ाद

चंद्रशेखर आज़ाद

HSRA के कमांडर-इन-चीफ। जेल से बाहर रहते हुए भूख हड़ताल के लिए जनसमर्थन जुटाया और संगठन को सक्रिय रखा। 27 फरवरी 1931 को शहीद।

पूरा जीवन परिचय →
विशेष तथ्य: भगत सिंह ने 116 दिन की भूख हड़ताल के दौरान भी पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ा। उनकी “जेल नोटबुक” — जिसमें मार्क्स, लेनिन और क्रांतिकारी विचारधारा के नोट्स हैं — आज भी उपलब्ध है। जतींद्रनाथ दास ने force-feeding को भी अस्वीकार किया और अपनी शहादत तक अनशन जारी रखा। यह भूख हड़ताल भारत का पहला documented “political fast unto death” मानी जाती है।

जेल भूख हड़ताल — त्वरित तथ्य

13 जून
1929 — भूख हड़ताल की शुरुआत, लाहौर और दिल्ली एक साथ
116
दिन — भगत सिंह का कुल अनशन (सबसे लंबा)
63
दिन — जतींद्रनाथ दास का अनशन, शहादत तक
13 सितं
1929 — जतींद्रनाथ दास की शहादत, लाहौर जेल
📋 जेल भूख हड़ताल (1929) — मुख्य तथ्य तालिका
घटनाजेल भूख हड़ताल (Prison Hunger Strike 1929)
शुरुआत13 जून 1929
स्थानलाहौर सेंट्रल जेल (मुख्य), दिल्ली बोर्स्टल जेल
संगठनHSRA — हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
प्रमुख माँगेंराजनीतिक कैदियों को यूरोपीय कैदियों जैसा व्यवहार, पढ़ने-लिखने का अधिकार, बेहतर भोजन, कठोर श्रम से मुक्ति
प्रमुख अनशनकर्ताभगत सिंह (116 दिन), जतींद्रनाथ दास (63 दिन), बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव थापर
शहादतजतींद्रनाथ दास — 13 सितंबर 1929, लाहौर जेल, आयु 25 वर्ष
परिणामराष्ट्रव्यापी आक्रोश, HSRA को व्यापक जनसमर्थन, कुछ माँगें आंशिक रूप से स्वीकार
ऐतिहासिक महत्वभारत का पहला “political fast unto death”, जेल सुधार की राष्ट्रीय माँग

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1929 की जेल भूख हड़ताल को समझने के लिए उस पूरे संदर्भ को जानना आवश्यक है। दिसंबर 1928 में सांडर्स वध के बाद भगत सिंह और उनके साथी कुछ समय के लिए भूमिगत रहे। फिर 8 अप्रैल 1929 को असेंबली बम कांड में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी।[1]

जेल में पहुँचने के बाद उन्होंने जो देखा वह अत्यंत अपमानजनक था। राजनीतिक कैदियों के साथ सामान्य अपराधियों जैसा — बल्कि कभी-कभी उनसे भी बुरा — व्यवहार होता था। जबकि यूरोपीय कैदियों को अलग और बेहतर सुविधाएँ मिलती थीं। यह नस्लभेद नीति ब्रिटिश साम्राज्य के दोहरे चरित्र का प्रमाण था।

ऐतिहासिक संदर्भ

ब्रिटिश जेल नियमावली के अनुसार “Class A” कैदियों को (जिनमें अधिकतर यूरोपीय होते थे) पढ़ने-लिखने का अधिकार, बेहतर भोजन और अलग सुविधाएँ मिलती थीं। भारतीय राजनीतिक कैदियों को “Class C” में रखा जाता था — जहाँ ये सुविधाएँ नहीं थीं। यह विभाजन पूरी तरह नस्लीय था।

भगत सिंह ने इसे व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रश्न के रूप में उठाया — राजनीतिक कैदी अपराधी नहीं हैं, वे देश के लिए लड़ रहे हैं।

भूख हड़ताल के कारण

जेल भूख हड़ताल के पीछे एक नहीं, कई कारण थे। ये सभी मिलकर एक ऐसी स्थिति बना रहे थे जिसमें चुप रहना संभव नहीं था।[2]

नस्लीय भेदभाव: यूरोपीय कैदियों को Class A — बेहतर भोजन, पढ़ाई का अधिकार। भारतीय राजनीतिक कैदियों को Class C — सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार।
पढ़ने-लिखने पर प्रतिबंध: राजनीतिक कैदियों को किताबें, कागज़ और कलम रखने की अनुमति नहीं थी। भगत सिंह जैसे विचारक के लिए यह असहनीय था।
घटिया भोजन: जेल में मिलने वाला भोजन अत्यंत अस्वास्थ्यकर था — न पर्याप्त मात्रा, न पोषण।
कठोर श्रम: कैदियों को जबरदस्ती कठोर श्रम करवाया जाता था जो राजनीतिक कैदियों की गरिमा के विरुद्ध था।
अपमानजनक व्यवहार: जेल अधिकारियों का भारतीय कैदियों के साथ अपमानजनक और क्रूर व्यवहार।
राजनीतिक पहचान की माँग: भगत सिंह का तर्क था कि जो देश के लिए लड़ रहे हैं वे अपराधी नहीं — उन्हें “Political Prisoner” का दर्जा मिलना चाहिए।

जेल में क्रांतिकारियों की स्थिति

1929 में लाहौर सेंट्रल जेल की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। कोठरियाँ छोटी, अँधेरी और नमी भरी थीं।[2]

लाहौर जेल 1929 — स्थिति का विवरण ऐतिहासिक दस्तावेज़ों पर आधारित
🍽️
भोजन: अत्यंत घटिया — सड़ी हुई दाल, कच्ची रोटी। न पर्याप्त मात्रा, न पोषण।
📚
पढ़ाई पर प्रतिबंध: किताबें, कागज़ और कलम रखने की अनुमति नहीं। भगत सिंह को छुपकर नोट्स बनाने पड़ते थे।
⛓️
कठोर श्रम: चक्की पीसना, बर्तन साफ करना — राजनीतिक कैदियों के लिए अपमानजनक।
🏥
चिकित्सा सुविधा: नगण्य। बीमारी पर जेल डॉक्टर की अनदेखी आम बात थी।
👔
यूरोपीय vs भारतीय: एक ही जेल में यूरोपीय कैदियों को अलग बेहतर कमरे, खाना और सुविधाएँ। खुला नस्लभेद।

माँगें क्या थीं?

⚖️
समान दर्जे की माँग
राजनीतिक कैदियों को यूरोपीय कैदियों के समान “Class A” का दर्जा। नस्लीय भेदभाव का अंत।
📚
पढ़ने-लिखने का अधिकार
जेल में किताबें, अखबार, कागज़ और कलम रखने की अनुमति। बौद्धिक जीवन का अधिकार।
🍽️
बेहतर भोजन
पौष्टिक और स्वच्छ भोजन। घटिया और अस्वास्थ्यकर खाने की व्यवस्था का अंत।
🏛️
राजनीतिक कैदी का दर्जा
देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों को सामान्य अपराधियों के साथ न रखा जाए।

भूख हड़ताल की शुरुआत — 13 जून 1929

13 जून 1929 — यह वह दिन था जब भगत सिंह ने लाहौर जेल में और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की बोर्स्टल जेल में एक साथ भूख हड़ताल शुरू की। यह निर्णय अचानक नहीं था — महीनों तक जेल की अमानवीय स्थितियों को झेलने के बाद लिया गया था।[3]

जेल अधिकारियों ने शुरुआत में इसे गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें लगा कि कुछ दिनों में अनशनकर्ता थककर खाना खाने लगेंगे। लेकिन जब दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदलने लगे, तो प्रशासन की चिंता बढ़ने लगी।

ऐतिहासिक प्रसंग

भगत सिंह का जेल से पत्र

भूख हड़ताल के दौरान भगत सिंह ने जेल से अनेक पत्र लिखे। उन्होंने लिखा — “हम भूख से नहीं, अपमान से लड़ रहे हैं। एक राजनीतिक कैदी का सम्मान उसकी व्यक्तिगत माँग नहीं, यह उसका अधिकार है।”

स्रोत: Chaman Lal (Ed.), Bhagat Singh: The Jail Notebook and Other Writings (Leftword Books, 2007)

भगत सिंह की भूमिका — 116 दिन का अनशन

भगत सिंह जेल भूख हड़ताल के मुख्य प्रेरक थे। उन्होंने इसे केवल व्यक्तिगत सुविधा की माँग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया। उनका तर्क था — जो देश के लिए लड़ रहे हैं वे अपराधी नहीं, राजनीतिक कैदी हैं।[3]

भगत सिंह ने 116 दिन तक भूख हड़ताल की। इस दौरान जेल प्रशासन ने नाक से नली डालकर जबरदस्ती खाना खिलाने (force-feeding) की कोशिश की — जो अत्यंत दर्दनाक और अपमानजनक प्रक्रिया थी।

“भूख हड़ताल राजनीतिक हथियार है। जब अन्य सभी रास्ते बंद हों, तो अपने शरीर को ही विरोध का माध्यम बनाना पड़ता है।”
— भगत सिंह, जेल से पत्र, 1929
क्या आप जानते हैं?

भगत सिंह ने 116 दिन की भूख हड़ताल के दौरान भी पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ा। उन्होंने मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन के विचारों का गहन अध्ययन किया। उनकी “जेल नोटबुक” इस काल की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज़ों में से एक है।

जतींद्रनाथ दास की भूमिका — 63 दिन की शहादत

जतींद्रनाथ दास कलकत्ता के रहने वाले थे। क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण वे पंजाब आए और HSRA से जुड़े। जेल में उन्होंने भूख हड़ताल का जो संकल्प लिया, उससे पीछे नहीं हटे — चाहे कितना भी दबाव डाला गया।[3]

63 दिन — लगभग दो महीने — बिना भोजन के। जेल डॉक्टरों ने बार-बार force-feeding की कोशिश की। परिवार और मित्रों ने अनुरोध किया। लेकिन जतींद्रनाथ दास अटल रहे। 13 सितंबर 1929 को वे शहीद हो गए।

शहादत का क्षण

13 सितंबर 1929 — लाहौर जेल

जब जतींद्रनाथ दास ने अंतिम साँस ली, तब लाहौर जेल में उपस्थित अन्य कैदियों ने “इंकलाब ज़िंदाबाद” के नारे लगाए। उनकी खबर पूरे देश में बिजली की तरह फैली। सुभाष चंद्र बोस तुरंत लाहौर पहुँचे।

स्रोत: National Archives of India — Lahore Conspiracy Case Documents; Manmathnath Gupta, They Lived Dangerously

बटुकेश्वर दत्त की भूमिका — दिल्ली जेल में अनशन

बटुकेश्वर दत्त असेंबली बम कांड में भगत सिंह के साथी थे। उन्हें दिल्ली की बोर्स्टल जेल में रखा गया था। 13 जून 1929 को भगत सिंह के साथ एक समन्वित योजना के तहत उन्होंने दिल्ली जेल में भूख हड़ताल शुरू की। दो अलग-अलग जेलों में एक साथ भूख हड़ताल शुरू करना HSRA की समन्वय क्षमता का प्रमाण था।[2]

सुखदेव थापर की भूमिका

सुखदेव थापर लाहौर षड्यंत्र केस के आरोपी के रूप में लाहौर जेल में बंद थे। उन्होंने भी भूख हड़ताल में सहभागिता की। सुखदेव ने जेल के भीतर भी साथियों का मनोबल बनाए रखने में योगदान दिया।[2]

विस्तृत टाइमलाइन — जेल भूख हड़ताल 1929

8 अप्रैल 1929
असेंबली बम कांड: भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली विधानसभा में बम फेंके और स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी।
मई 1929
स्थानांतरण: भगत सिंह को लाहौर जेल स्थानांतरित किया गया — लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई के लिए।
13 जून 1929
भूख हड़ताल की शुरुआत: भगत सिंह (लाहौर जेल) और बटुकेश्वर दत्त (दिल्ली जेल) ने एक साथ भूख हड़ताल शुरू की। जतींद्रनाथ दास, सुखदेव थापर भी शामिल हुए।
जुलाई 1929
जागरूकता फैलना: भूख हड़ताल की खबर समाचारपत्रों में छपी। पूरे देश में जानकारी फैली। जेल प्रशासन की चिंता बढ़ी।
जुलाई–अगस्त
Force-Feeding: जेल अधिकारियों ने नाक से नली डालकर जबरदस्ती खाना खिलाने की क्रूर प्रक्रिया शुरू की। यह सार्वजनिक हुई और आक्रोश बढ़ा।
अगस्त 1929
संसद में प्रश्न: भारतीय विधायकों ने केंद्रीय विधानसभा में सरकार से प्रश्न किए। मामला राष्ट्रीय राजनीति में आया।
सितंबर 1929
जतींद्रनाथ दास की हालत गंभीर: 60+ दिनों के अनशन के बाद स्थिति अत्यंत गंभीर। चिकित्सकों ने जीवन की संभावना न्यून बताई।
13 सितं 1929
जतींद्रनाथ दास की शहादत: 63 दिन की अटूट भूख हड़ताल के बाद लाहौर जेल में शहीद। उनकी उम्र 25 वर्ष थी।
सितंबर 1929
राष्ट्रीय आक्रोश: देशभर में हड़तालें और प्रदर्शन। सुभाष चंद्र बोस लाहौर पहुँचे। पार्थिव शरीर कलकत्ता ले जाया गया।
अक्टूबर 1929
भगत सिंह का अनशन समाप्त: परिवार और साथियों के अनुरोध पर 116 दिन बाद भूख हड़ताल समाप्त।
7 अक्ट 1930
लाहौर षड्यंत्र केस का फैसला: भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को मृत्युदंड।
23 मार्च 1931
शहादत: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फाँसी।

जतींद्रनाथ दास की शहादत — 13 सितंबर 1929

13 सितंबर 1929 की दोपहर — लाहौर सेंट्रल जेल। 63 दिन बिना एक दाना खाए — जतींद्रनाथ दास ने अपने प्राण त्याग दिए। वे 25 वर्ष के थे।[4]

“जतींद्रनाथ दास ने मरते-मरते भी जेल प्रशासन के सामने घुटने नहीं टेके। उनकी शहादत भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे पवित्र आहुतियों में से एक है।”

— ऐतिहासिक मूल्यांकन

जतींद्रनाथ दास की शहादत की खबर सुनते ही देश में हाहाकार मच गया। सुभाष चंद्र बोस तत्काल लाहौर पहुँचे। उनके पार्थिव शरीर के साथ ट्रेन में बैठकर कलकत्ता की यात्रा की। रास्ते में पड़ने वाले हर स्टेशन — अंबाला, दिल्ली, इलाहाबाद, वाराणसी — पर हज़ारों-लाखों लोगों ने श्रद्धांजलि दी।

63
दिन की अटूट भूख हड़ताल
25
वर्ष की आयु में शहादत
13 सितं
1929 — शहादत की तारीख, लाहौर जेल
लाखों
लोगों ने रास्ते में श्रद्धांजलि दी

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया

ब्रिटिश सरकार ने भूख हड़ताल को शुरुआत में नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की। जेल प्रशासन ने force-feeding की प्रक्रिया अपनाई — नाक से नली डालकर जबरदस्ती खाना खिलाना। यह प्रक्रिया जब सार्वजनिक हुई, तो ब्रिटिश सरकार की आलोचना और बढ़ गई।[4]

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया — चरणबद्ध जून–सितंबर 1929
😤
नज़रअंदाज़: शुरुआत में जेल प्रशासन ने गंभीरता से नहीं लिया — सोचा कि कुछ दिनों में अनशन टूट जाएगा।
Force-Feeding: जब अनशन लंबा खिंचा, नाक से नली डालकर जबरदस्ती खाना खिलाना शुरू किया — अत्यंत दर्दनाक।
📋
संसदीय दबाव: केंद्रीय विधानसभा में सरकार पर प्रश्न। पंजाब गवर्नर को सफाई देनी पड़ी।
😰
जतींद्रनाथ दास की शहादत के बाद: सरकार बैकफुट पर। कुछ आंशिक माँगें मानने की प्रक्रिया — लेकिन राजनीतिक कैदी का दर्जा देने से इनकार।

भारतीय जनता की प्रतिक्रिया

जेल भूख हड़ताल ने पूरे देश को एकजुट किया। जतींद्रनाथ दास की शहादत के बाद तो जनप्रतिक्रिया तूफान में बदल गई।[4]

क्या आप जानते हैं?

जतींद्रनाथ दास के अंतिम संस्कार में कलकत्ता में लगभग 5 लाख लोग उपस्थित थे — यह उस समय की सबसे बड़ी अंतिम यात्राओं में से एक थी। सुभाष चंद्र बोस ने पूरी ट्रेन यात्रा उनके पार्थिव शरीर के साथ की। लाहौर से कलकत्ता — हर स्टेशन पर श्रद्धांजलि।

समाचारपत्रों की प्रतिक्रिया

1929 में भूख हड़ताल की खबरें भारत के प्रमुख समाचारपत्रों में छाई रहीं। ट्रिब्यून (लाहौर), अमृत बाज़ार पत्रिका (कलकत्ता), यंग इंडिया और अन्य पत्रों ने इस संघर्ष को विस्तार से कवर किया।[5]

मीडिया कवरेज का प्रभाव

समाचारपत्रों की कवरेज ने भूख हड़ताल को एक स्थानीय जेल-विवाद से राष्ट्रीय आंदोलन में बदला। जब force-feeding की खबरें छपीं, तो पूरे देश में आक्रोश फैला। जतींद्रनाथ दास की शहादत की खबर “Breaking News” की तरह फैली। इस मीडिया कवरेज ने HSRA को जो जनसमर्थन दिलाया, वह किसी भी अन्य माध्यम से संभव नहीं था।

भूख हड़ताल के परिणाम

📚
आंशिक माँगें मानी गईं
ब्रिटिश सरकार ने जेल में पढ़ने-लिखने की सुविधा और बेहतर भोजन की कुछ माँगें आंशिक रूप से स्वीकार कीं।
🔥
HSRA को जनसमर्थन
जतींद्रनाथ दास की शहादत ने HSRA को अभूतपूर्व जनसमर्थन दिलाया। भगत सिंह राष्ट्रीय नायक बन गए।
⚖️
राजनीतिक दबाव
केंद्रीय विधानसभा में ब्रिटिश सरकार पर दबाव बढ़ा। जेल सुधार की माँग राष्ट्रीय एजेंडे पर आई।
💡
वैचारिक प्रभाव
यह सिद्ध हुआ कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध भी शक्तिशाली हो सकता है। “Political Prisoner” की अवधारणा को बल मिला।

संबंधित घटनाओं से संबंध

जेल भूख हड़ताल — कारण-परिणाम श्रृंखला 1928–1931
🔗
सांडर्स वध (1928): HSRA की पहली बड़ी कार्रवाई — जिसने भगत सिंह को राष्ट्रीय पहचान दी।
💣
असेंबली बम कांड (1929): भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी — जेल भूख हड़ताल का प्रत्यक्ष कारण।
⚖️
लाहौर षड्यंत्र केस (1929–31): भूख हड़ताल के दौरान ही यह मुकदमा चल रहा था। दोनों घटनाएँ समानांतर थीं।
HSRA: यह कार्रवाई HSRA की वैचारिक परिपक्वता का प्रमाण — केवल हथियार नहीं, नैतिक संघर्ष भी।
🌹
23 मार्च 1931: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी — जेल भूख हड़ताल के उसी संघर्ष की अंतिम कड़ी।
कारण-परिणाम श्रृंखला

सांडर्स वध → असेंबली बम कांड → जेल भूख हड़ताल → जतींद्रनाथ दास की शहादत → लाहौर षड्यंत्र केस → 23 मार्च 1931 की शहादत — यह एक अटूट श्रृंखला है जिसमें जेल भूख हड़ताल एक महत्वपूर्ण और निर्णायक कड़ी है।

स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव

जेल भूख हड़ताल का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव बहुआयामी था।[5]

जेल भूख हड़ताल की विरासत — पाँच आयाम
प्रतिरोध का नया मार्ग
अहिंसक भूख हड़ताल को राजनीतिक हथियार के रूप में स्थापित किया।
जतींद्रनाथ दास की शहादत
भारत का पहला “political fast unto death” — एक नई परंपरा।
HSRA की व्यापक पहचान
HSRA को केवल “क्रांतिकारी” से “नैतिक संघर्षशील” संगठन के रूप में स्थापित किया।
जेल सुधार की माँग
राजनीतिक कैदियों के अधिकारों का प्रश्न पहली बार राष्ट्रीय एजेंडे पर आया।
अनशन की परंपरा
भारतीय राजनीति में अनशन को एक वैध और प्रभावशाली राजनीतिक हथियार के रूप में स्थापित किया।

मिथक बनाम तथ्य — जेल भूख हड़ताल 1929

मिथक / भ्रांतिऐतिहासिक तथ्य
भगत सिंह ने 63 दिन भूख हड़ताल की।नहीं। 63 दिन जतींद्रनाथ दास ने अनशन किया और शहीद हुए। भगत सिंह ने 116 दिन अनशन किया।
भूख हड़ताल केवल खाने की माँग के लिए थी।नहीं। मुख्य माँग राजनीतिक कैदियों को उचित दर्जा और यूरोपीय कैदियों के समान अधिकार देना था।
जतींद्रनाथ दास भूख से मरे।वे भूख हड़ताल के कारण शरीर कमज़ोर होने से शहीद हुए — यह एक राजनीतिक शहादत थी।
भूख हड़ताल में केवल भगत सिंह शामिल थे।भगत सिंह, जतींद्रनाथ दास, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव थापर सहित कई HSRA सदस्य शामिल थे।
ब्रिटिश सरकार ने सभी माँगें मान लीं।केवल आंशिक माँगें स्वीकार हुईं। राजनीतिक कैदी का दर्जा देने से इनकार किया गया।
भूख हड़ताल गांधी जी की प्रेरणा से हुई।यह HSRA की स्वतंत्र रणनीति थी। गांधी जी ने इस भूख हड़ताल की न प्रेरणा दी, न खुलकर समर्थन।
भगत सिंह को Force-feeding से अनशन तोड़ना पड़ा।भगत सिंह ने 116 दिन बाद परिवार और साथियों के अनुरोध पर स्वेच्छा से अनशन समाप्त किया।
जतींद्रनाथ दास बंगाल से थे और पंजाब से उनका कोई संबंध नहीं था।वे कलकत्ता के रहने वाले थे लेकिन HSRA में शामिल होकर पंजाब आए और लाहौर जेल में शहीद हुए।
यह भारत की पहली राजनीतिक भूख हड़ताल थी।यह भारत का पहला documented “political fast unto death” था — जहाँ किसी ने राजनीतिक माँगों के लिए भूख हड़ताल में अपने प्राण त्याग दिए।
इस भूख हड़ताल का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं।इसने HSRA को अभूतपूर्व जनसमर्थन दिलाया, जेल सुधार की माँग को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया और अनशन को राजनीतिक हथियार के रूप में स्थापित किया।

60 सेकंड में जेल भूख हड़ताल 1929

⏱ 60 सेकंड में जेल भूख हड़ताल — Voice Assistant के लिए

1929 में असेंबली बम कांड के बाद भगत सिंह और उनके साथी जेल में बंद थे। जेल में राजनीतिक कैदियों के साथ नस्लीय भेदभाव होता था।

13 जून 1929 को भगत सिंह ने लाहौर जेल और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली जेल में एक साथ भूख हड़ताल शुरू की। जतींद्रनाथ दास भी शामिल हुए। माँगें थीं — समान अधिकार, पढ़ने-लिखने की सुविधा, बेहतर भोजन।

जतींद्रनाथ दास 63 दिन तक अनशन पर रहे और 13 सितंबर 1929 को शहीद हो गए। भगत सिंह ने 116 दिन अनशन किया। इस शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया और HSRA को अभूतपूर्व जनसमर्थन मिला।


लोग यह भी पूछते हैं

Qजेल भूख हड़ताल 1929 कब शुरू हुई?
जेल भूख हड़ताल 13 जून 1929 को शुरू हुई। भगत सिंह ने लाहौर जेल में और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की बोर्स्टल जेल में एक साथ अनशन शुरू किया।
Qजतींद्रनाथ दास ने कितने दिन भूख हड़ताल की?
जतींद्रनाथ दास ने 63 दिन भूख हड़ताल की। 13 जून 1929 को शुरू करके 13 सितंबर 1929 को उनकी शहादत हुई। वे 25 वर्ष के थे।
Qभगत सिंह ने कितने दिन भूख हड़ताल की?
भगत सिंह ने 116 दिन भूख हड़ताल की — 13 जून से अक्टूबर 1929 तक। यह भारतीय इतिहास के सबसे लंबे राजनीतिक अनशनों में से एक है।
Qजेल भूख हड़ताल की मुख्य माँगें क्या थीं?
तीन मुख्य माँगें थीं — (1) राजनीतिक कैदियों को यूरोपीय कैदियों के समान “Class A” दर्जा, (2) पढ़ने-लिखने का अधिकार, (3) बेहतर और पौष्टिक भोजन और कठोर श्रम से मुक्ति।
Qजतींद्रनाथ दास की शहादत कब और कैसे हुई?
जतींद्रनाथ दास 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में शहीद हुए। 63 दिन की अटूट भूख हड़ताल के बाद उनका शरीर कमज़ोर पड़ गया। उन्होंने force-feeding को भी अस्वीकार किया।
Qभगत सिंह की भूख हड़ताल क्यों समाप्त हुई?
116 दिन के बाद भगत सिंह ने परिवार और साथियों के अनुरोध पर स्वेच्छा से भूख हड़ताल समाप्त की। ब्रिटिश सरकार ने कुछ आंशिक माँगें स्वीकार कीं।
QForce-feeding क्या था?
Force-feeding वह प्रक्रिया थी जिसमें जेल अधिकारी नाक से नली डालकर जबरदस्ती खाना खिलाते थे — यह अत्यंत दर्दनाक था। जब यह सार्वजनिक हुई, तो ब्रिटिश सरकार की और आलोचना हुई।
Qजतींद्रनाथ दास के पार्थिव शरीर को कलकत्ता कौन ले गया?
सुभाष चंद्र बोस लाहौर पहुँचे और जतींद्रनाथ दास के पार्थिव शरीर के साथ ट्रेन से कलकत्ता गए। रास्ते में हर स्टेशन पर लाखों लोगों ने श्रद्धांजलि दी।
Qजेल भूख हड़ताल का असेंबली बम कांड से क्या संबंध है?
असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929) के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार किया गया। जेल में नस्लभेदी स्थितियाँ देखकर उन्होंने 13 जून 1929 को भूख हड़ताल शुरू की।
Qजेल भूख हड़ताल का लाहौर षड्यंत्र केस से क्या संबंध है?
लाहौर षड्यंत्र केस और जेल भूख हड़ताल एक साथ चल रहे थे। मुकदमे के दौरान ही अनशन हुआ। जतींद्रनाथ दास भी इसी मुकदमे के आरोपी थे।

FAQ — जेल भूख हड़ताल 1929

Qजतींद्रनाथ दास कौन थे?
जतींद्रनाथ दास (1904–1929) कलकत्ता के क्रांतिकारी और HSRA के सदस्य थे। वे लाहौर षड्यंत्र केस में आरोपी बने। 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद 25 वर्ष की आयु में शहीद हुए।
Qक्या यह भारत की पहली political fast unto death थी?
हाँ। जतींद्रनाथ दास की शहादत को भारतीय इतिहास में पहली documented “political fast unto death” माना जाता है — जहाँ किसी क्रांतिकारी ने राजनीतिक माँगों के लिए भूख हड़ताल करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
Qक्या जेल भूख हड़ताल सफल रही?
आंशिक रूप से सफल रही। पढ़ने-लिखने की सुविधा और बेहतर भोजन की माँगें मानी गईं। लेकिन मुख्य माँग — राजनीतिक कैदी का दर्जा — नहीं मानी गई। सबसे बड़ी सफलता थी HSRA को अभूतपूर्व जनसमर्थन।
QHSRA क्या था?
HSRA — हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन — 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में स्थापित भारत का प्रमुख क्रांतिकारी संगठन था।
Qगांधी जी की इस भूख हड़ताल पर क्या प्रतिक्रिया थी?
महात्मा गांधी ने HSRA की क्रांतिकारी पद्धति से असहमति जताई थी। जेल भूख हड़ताल पर उनका रुख मिलाजुला था। उन्होंने जतींद्रनाथ दास की शहादत पर श्रद्धांजलि दी लेकिन HSRA की पद्धति का खुलकर समर्थन नहीं किया।
Qजेल में कितने HSRA सदस्यों ने भूख हड़ताल की?
भगत सिंह, जतींद्रनाथ दास, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव थापर, राजगुरु सहित HSRA के कई सदस्य शामिल थे। लाहौर और दिल्ली — दो अलग-अलग जेलों में एक साथ अनशन शुरू हुआ।
Qजेल भूख हड़ताल का आधुनिक भारत पर क्या प्रभाव है?
जेल भूख हड़ताल 1929 ने भारतीय राजनीति में अनशन को एक वैध और शक्तिशाली राजनीतिक हथियार के रूप में स्थापित किया। स्वतंत्र भारत में भी अनेक अनशन आंदोलन इसी परंपरा की विरासत हैं।

निष्कर्ष — जेल भूख हड़ताल: एक अमर संघर्ष

1929 की जेल भूख हड़ताल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह अध्याय है जो बंदूक और बम से नहीं, बल्कि अपने शरीर को अर्पित करके लड़ा गया। भगत सिंह का 116 दिन का अनशन और जतींद्रनाथ दास की 63 दिन की शहादत — ये संख्याएँ केवल दिनों की गिनती नहीं, असाधारण मानवीय साहस और संकल्प के प्रमाण हैं।

इस भूख हड़ताल ने यह सिद्ध किया कि HSRA के क्रांतिकारी केवल हथियारों के लड़ाके नहीं थे — वे वैचारिक रूप से परिपक्व, नैतिक रूप से साहसी और मानवीय गरिमा के लिए प्रतिबद्ध थे।

“भूख हड़ताल भी युद्ध है — जब दुश्मन के सामने अपना शरीर रखकर कहा जाए कि हम झुकेंगे नहीं।”

— ऐतिहासिक मूल्यांकन

जतींद्रनाथ दास का नाम इतिहास में उतना नहीं मिलता जितना मिलना चाहिए। वे भगत सिंह के साथ खड़े थे — उसी साहस, उसी संकल्प और उसी त्याग के साथ। उनकी शहादत को याद रखना केवल इतिहास को याद रखना नहीं, बल्कि उस मानवीय गरिमा को स्वीकार करना है जो किसी भी साम्राज्य से बड़ी होती है।

स्रोत एवं संदर्भ

  1. National Archives of India — Lahore Conspiracy Case Records; Hunger Strike Documents 1929, New Delhi
  2. Parliament of India Archives — Central Legislative Assembly Debates, 1929; Hunger Strike Questions
  3. Chaman Lal (Ed.), Bhagat Singh: The Jail Notebook and Other Writings (Leftword Books, 2007)
  4. Manmathnath Gupta, They Lived Dangerously: Reminiscences of a Revolutionary (People’s Publishing House, 1969)
  5. Nehru Memorial Museum & Library — HSRA Documents; Jatin Das Files; Contemporary Newspaper Clippings 1929
  6. Bipan Chandra, India’s Struggle for Independence (Penguin Books, 1989)
  7. Punjab Digital Library — Lahore Tribune, Amrita Bazar Patrika, 1929 Reports
✓ तथ्य-जाँच एवं संपादकीय नोट

यह लेख राजनीतिक रूप से तटस्थ, तथ्य-आधारित और ऐतिहासिक रूप से सत्यापित जानकारी पर आधारित है। कोई भी उद्धरण, तारीख या घटना बिना ऐतिहासिक प्रमाण के नहीं लिखी गई है।

अंतिम अपडेट: जून 2026 | स्रोत सत्यापन के बाद प्रकाशित

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