असेंबली बम कांड (1929)
असेंबली बम कांड 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में घटित हुई एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी घटना थी। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने HSRA के निर्देश पर विधानसभा की दर्शक दीर्घा से दो कम-शक्ति के बम फेंके और “इंकलाब ज़िंदाबाद” के नारे लगाए। बम जानबूझकर कम शक्ति के थे — उद्देश्य हत्या नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार के दमनकारी Public Safety Bill और Trade Disputes Bill के विरुद्ध जन-चेतना जागृत करना था। दोनों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी और अदालत को अपने विचारों के प्रचार का मंच बनाया।
- क्या: केंद्रीय विधानसभा, दिल्ली में बम फेंकने की क्रांतिकारी घटना — हत्या नहीं, राजनीतिक विरोध का प्रतीकात्मक प्रदर्शन
- कब: , दोपहर लगभग 12:30 बजे
- कहाँ: सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली (केंद्रीय विधानसभा), दिल्ली (वर्तमान संसद भवन परिसर)
- कौन: भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त — HSRA की ओर से
- क्यों: Public Safety Bill और Trade Disputes Bill का विरोध; “बहरों को सुनाने के लिए धमाका ज़रूरी है”
- परिणाम: दोनों की गिरफ्तारी → लाहौर षड्यंत्र केस → भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की 23 मार्च 1931 को फाँसी
असेंबली बम कांड क्या था?
8 अप्रैल 1929 का वह दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में उस दिन जो हुआ, उसने न केवल ब्रिटिश सत्ता को स्तब्ध कर दिया, बल्कि पूरे देश की जनचेतना को एक नए आयाम से जोड़ दिया।
असेंबली बम कांड — जिसे Central Legislative Assembly Bomb Case या Assembly Bomb Case भी कहते हैं — वह ऐतिहासिक क्रांतिकारी घटना है जिसमें भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के निर्देश पर दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा की दर्शक दीर्घा से दो कम-शक्ति के बम फेंके। साथ ही उन्होंने HSRA के क्रांतिकारी घोषणापत्र के पर्चे बिखेरे और “इंकलाब ज़िंदाबाद” और “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” के नारे लगाए।
यह कांड केवल एक विस्फोट नहीं था — यह एक सोची-समझी राजनीतिक कार्रवाई थी। बम जानबूझकर कम-शक्ति के थे ताकि कोई मारा न जाए। इस घटना का एकमात्र उद्देश्य था — ब्रिटिश सरकार के दमनकारी Public Safety Bill और Trade Disputes Bill के विरुद्ध आवाज़ उठाना और “बहरी” ब्रिटिश सत्ता को जगाना।[1]
असेंबली बम कांड में किसी की मृत्यु नहीं हुई — यह एक जानबूझकर की गई रणनीतिक चूक थी, गलती नहीं। भगत सिंह चाहते तो अधिक शक्तिशाली बम ले जा सकते थे। लेकिन उनका उद्देश्य हत्या नहीं, बल्कि दुनिया को एक संदेश देना था — “To Make the Deaf Hear” (बहरों को सुनाने के लिए)।
त्वरित तथ्य — Key Facts Table
| घटना का नाम | असेंबली बम कांड / Central Legislative Assembly Bomb Case |
| तारीख | , दोपहर लगभग 12:30 बजे |
| स्थान | केंद्रीय विधानसभा (Central Legislative Assembly), दिल्ली |
| मुख्य क्रांतिकारी | भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त |
| संगठन | हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) |
| विरोध का कारण | Public Safety Bill और Trade Disputes Bill के विरुद्ध |
| उद्देश्य | हत्या नहीं — “बहरों को सुनाने के लिए धमाका”, जनचेतना जागृत करना |
| बम की प्रकृति | जानबूझकर कम-शक्ति के — कोई मृत्यु नहीं |
| नारा | “इंकलाब ज़िंदाबाद” — “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” |
| गिरफ्तारी | दोनों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी — भागे नहीं |
| परिणाम | लाहौर षड्यंत्र केस → भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को फाँसी (23 मार्च 1931) |
| बटुकेश्वर दत्त की सजा | आजीवन कारावास — अंडमान भेजे गए |
| ऐतिहासिक महत्व | HSRA का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक कदम — भारतीय जनचेतना पर गहरा प्रभाव |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — साइमन कमीशन से सांडर्स वध तक
असेंबली बम कांड एक अकस्मात या स्वतःस्फूर्त घटना नहीं थी। इसकी जड़ें 1927–28 की कई बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं में थीं। इन घटनाओं की श्रृंखला को समझे बिना असेंबली बम कांड के गहरे अर्थ को नहीं पकड़ा जा सकता।[2]
साइमन कमीशन और लाला लाजपत राय की शहादत
1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय संविधान सुधारों की जाँच के लिए साइमन कमीशन गठित किया। इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था — यह भारतीयों के प्रति ब्रिटिश रवैये का प्रतीक था। पूरे देश में इसका जोरदार विरोध हुआ।
30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में शांतिपूर्ण जुलूस निकला। पुलिस अधीक्षक J.A. Scott के आदेश पर निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हुआ। लाला जी को सिर और सीने पर गंभीर चोटें आईं। 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया।
लाला जी की अंतिम वाणी
लाठीचार्ज के बाद लाला लाजपत राय ने कहा था — “मेरे शरीर पर लगी हर चोट ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में एक कील साबित होगी।” यह भविष्यवाणी सही साबित हुई। उनकी मृत्यु ने HSRA के क्रांतिकारियों में एक नई आग जला दी।
स्रोत: Nehru Memorial Museum & Library — Simon Commission Protest Records; Bipan Chandra, India’s Struggle for Independenceसांडर्स वध — HSRA का बदला
HSRA ने लाला जी की मृत्यु का बदला लेने का निर्णय किया। 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद ने लाहौर में ASP J.P. Saunders को गोली मारी। लक्ष्य Scott था, किंतु पहचान में भूल के कारण Saunders को निशाना बनाया गया।
सांडर्स वध के बाद दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को लाहौर से सुरक्षित बाहर निकालने में निर्णायक भूमिका निभाई। वे भगत सिंह की पत्नी का रूप धरकर ट्रेन में उनके साथ बैठीं। यह HSRA की संगठनात्मक दक्षता का प्रमाण था।[3]
अब HSRA के सामने अगला प्रश्न था — ब्रिटिश दमन के विरुद्ध अगला कदम क्या हो? यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें असेंबली बम कांड की योजना जन्मी।
Public Safety Bill और Trade Disputes Bill — दमन के दो हथियार
Public Safety Bill (1929) एक ब्रिटिश प्रस्तावित कानून था जो सरकार को किसी भी “अवांछित विदेशी” को बिना मुकदमे के देश से निकालने और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिना वारंट गिरफ्तार करने का अधिकार देता। इसका मुख्य उद्देश्य था — भारत में बढ़ रहे मज़दूर आंदोलन और साम्यवादी प्रभाव को कुचलना।
1929 की शुरुआत में ब्रिटिश भारत सरकार दो विवादास्पद विधेयकों को पारित कराने की कोशिश कर रही थी। ये विधेयक भारतीय जनता, श्रमिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मौलिक अधिकारों पर सीधा हमला थे।[1]
HSRA की दृष्टि में ये दोनों विधेयक ब्रिटिश साम्राज्यवाद के उस चेहरे का प्रतिनिधित्व करते थे जो भारतीय मज़दूर वर्ग और राजनीतिक आंदोलन को कुचलना चाहता था। भगत सिंह के लिए यह केवल एक राजनीतिक विधेयक नहीं था — यह पूँजीवादी साम्राज्यवाद का वह हथियार था जिसके विरुद्ध समाजवादी क्रांति अनिवार्य थी।
HSRA की रणनीति — बम क्यों और कैसे?
HSRA के भीतर असेंबली बम कांड की योजना पर गहन विचार-विमर्श हुआ। चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव थापर और भगवती चरण वोहरा ने इस योजना को अंतिम रूप दिया।[2]
HSRA की रणनीति स्पष्ट थी — विधानसभा में बम फेंकना ताकि:
असेंबली बम कांड HSRA की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता थी। बम फेंकना और गिरफ्तारी देना — यह दो-चरणीय योजना थी। पहले चरण ने दुनिया का ध्यान खींचा, दूसरे चरण ने दुनिया को HSRA की विचारधारा से परिचित कराया। भगत सिंह का मुकदमा दुनिया के इतिहास के सबसे चर्चित राजनीतिक मुकदमों में से एक बन गया।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का चयन — क्यों वे दोनों?
HSRA के भीतर असेंबली में जाने के लिए स्वयंसेवक चुनने पर विचार हुआ। भगत सिंह ने स्वयं इस कार्य के लिए आगे आने की इच्छा व्यक्त की। आरंभ में चंद्रशेखर आज़ाद और कुछ अन्य साथियों ने भगत सिंह को न भेजने का आग्रह किया — क्योंकि वे सांडर्स वध में पहले ही आरोपी थे और उनकी पहचान उजागर होने का जोखिम था।[4]
किंतु भगत सिंह का तर्क था — इस कार्रवाई के बाद गिरफ्तारी और मुकदमा अपरिहार्य है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को जाना चाहिए जो अदालत में HSRA की विचारधारा को सबसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर सके। भगत सिंह के अनुसार, वे स्वयं सबसे उपयुक्त थे।
अंततः HSRA ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को इस ऐतिहासिक कार्रवाई के लिए चुना। भगत सिंह — जो HSRA की आवाज़ थे — और बटुकेश्वर दत्त — जो उनके अटूट साथी और बम-निर्माण में दक्ष थे।
बम फेंकने की योजना — तैयारी और रणनीति
असेंबली बम कांड की योजना को कई हफ्तों की मेहनत और सावधानी से तैयार किया गया। इसमें HSRA के कई प्रमुख नेताओं की भूमिका थी।[3]
बम की तैयारी
बम बटुकेश्वर दत्त और अन्य HSRA सदस्यों ने मिलकर तैयार किए। इन्हें जानबूझकर कम-शक्तिशाली बनाया गया। HSRA का स्पष्ट निर्देश था — बम इतने शक्तिशाली हों कि विस्फोट और धुआँ हो, लेकिन किसी की जान न जाए।
दर्शक पास की व्यवस्था
विधानसभा की दर्शक दीर्घा में प्रवेश के लिए पास की ज़रूरत थी। HSRA ने इसकी भी व्यवस्था की। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने पहले से विधानसभा का निरीक्षण किया और दर्शक दीर्घा की स्थिति को समझा।
घोषणापत्र के पर्चे
HSRA ने हिंदी और अंग्रेज़ी में पर्चे तैयार किए जिनमें कार्रवाई का उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। इन पर्चों को बम के साथ विधानसभा में बिखेरा जाना था ताकि मीडिया और जनता को तत्काल HSRA का संदेश मिल सके।
“बहरे कानों तक आवाज़ पहुँचाने के लिए ऊँची आवाज़ चाहिए।” (To Make the Deaf Hear) — इस एक वाक्य में HSRA ने असेंबली बम कांड का पूरा औचित्य समेट दिया था। ब्रिटिश साम्राज्य जनता की आवाज़ नहीं सुनता — इसलिए उन्हें “सुनाने” के लिए विस्फोट ज़रूरी था।
निकास योजना
महत्वपूर्ण बात यह है कि HSRA ने कोई निकास योजना नहीं बनाई। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार होना था — यह सोचा-समझा निर्णय था। भागने की कोई कोशिश नहीं की जानी थी। गिरफ्तारी ही इस कार्रवाई का अगला अनिवार्य चरण था।
8 अप्रैल 1929 की पूरी घटना — मिनट-दर-मिनट
8 अप्रैल 1929 का वह ऐतिहासिक दिन। दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में उस दिन Public Safety Bill पर विचार होना था। भवन में सदस्य, पत्रकार और दर्शक भर चुके थे। वायसराय के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।[1]
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दर्शक दीर्घा के पास की सीटों पर बैठे थे। वे सामान्य कपड़ों में थे — कोई संदेह नहीं। दोनों के कोट की जेब में बम थे और हाथों में HSRA के पर्चे।
जैसे ही विधानसभा की कार्यवाही शुरू हुई और Public Safety Bill पर चर्चा आरंभ हुई, दोपहर लगभग 12:30 बजे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त खड़े हो गए। उन्होंने दर्शक दीर्घा की रेलिंग से नीचे सदन के खाली भाग में दो बम फेंके।
तेज़ धमाका, धुआँ और अफरा-तफरी — सदस्य अपनी कुर्सियों से कूद पड़े। उसी क्षण भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने हवा में HSRA के पर्चे बिखेर दिए और ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाए — “इंकलाब ज़िंदाबाद!” और “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!”
दोनों भागे नहीं। जब पुलिस दौड़ी, तब भी वे नारे लगाते रहे। उन्होंने स्वेच्छा से अपने हाथ आगे कर दिए। गिरफ्तारी देना उनकी योजना का अनिवार्य हिस्सा था।
विस्फोट से कुछ सदस्यों को मामूली चोटें आईं, लेकिन कोई गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ और किसी की मृत्यु नहीं हुई — ठीक उसी तरह जैसा HSRA ने योजना बनाई थी।
“बहरे कानों तक आवाज़ पहुँचाने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत होती है।”
— HSRA पर्चा, 8 अप्रैल 1929, केंद्रीय विधानसभा, दिल्ली
केंद्रीय विधानसभा भवन — ऐतिहासिक स्थल का विवरण
जहाँ असेंबली बम कांड घटित हुआ, वह भवन आज भी दिल्ली में खड़ा है। यह सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली (Central Legislative Assembly) का भवन था — जिसे अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश भारत की संसद के रूप में 1927 में बनवाया था।
| भवन का नाम | सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली / केंद्रीय विधानसभा |
| निर्माण वर्ष | 1927 |
| वास्तुकार | Sir Edwin Lutyens और Sir Herbert Baker |
| स्थान | नई दिल्ली (संसद मार्ग के पास) |
| वर्तमान स्थिति | यह भवन वर्तमान में भारत की संसद परिसर का हिस्सा है (पुरानी संसद) |
| असेंबली बम कांड में भूमिका | 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इसी भवन की दर्शक दीर्घा से बम फेंके |
यह भवन ब्रिटिश शक्ति का प्रतीक था। यहाँ भारत के भविष्य के कानून बनाए जाते थे — ऐसे कानून जो अक्सर भारतीय जनता के विरुद्ध होते थे। HSRA ने इसीलिए इस स्थान को चुना — ताकि संदेश सीधा उन लोगों तक पहुँचे जो कानून बनाते हैं।
असेंबली बम कांड की विस्तृत टाइमलाइन
भगत सिंह की भूमिका — असेंबली बम कांड में
भगत सिंह असेंबली बम कांड के मुख्य नायक थे। लेकिन उनकी भूमिका केवल बम फेंकने तक सीमित नहीं थी — असली भूमिका तो उसके बाद शुरू हुई।
भगत सिंह ने जानबूझकर भागने से इनकार किया। वे जानते थे कि गिरफ्तारी होगी, मुकदमा होगा, और शायद फाँसी भी। लेकिन उनके लिए यह अवसर था — अदालत में खड़े होकर दुनिया को यह बताने का कि एक 22-23 वर्ष के युवक ने जान की परवाह क्यों नहीं की।[4]
“क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है।”— भगत सिंह
असेंबली में उनका आचरण
बम फेंकने के बाद जब पुलिस दौड़ी, तब भगत सिंह शांति से खड़े थे — नारे लगाते हुए। उन्होंने किसी पर कोई हथियार नहीं उठाया। जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा तो उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया। यह दृश्य उपस्थित सभी लोगों के लिए चमत्कारिक था।
मुकदमे में उनका बयान
भगत सिंह ने अदालत में कहा — हम आतंकवादी नहीं हैं। हमने किसी को चोट पहुँचाने के लिए बम नहीं फेंका। हमने एक नीरव और बहरी व्यवस्था को जगाने के लिए आवाज़ उठाई। उन्होंने HSRA की समाजवादी विचारधारा, साम्राज्यवाद की आलोचना और भारतीय जनता के शोषण का विस्तार से विवरण दिया।
असेंबली बम कांड के समय भगत सिंह की उम्र केवल 21-22 वर्ष थी। इस उम्र में उन्होंने जो परिपक्वता, साहस और वैचारिक स्पष्टता दिखाई, वह इतिहास में अद्वितीय है। उनके अदालती बयान आज भी भारतीय राजनीतिक चिंतन के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माने जाते हैं।
बटुकेश्वर दत्त की भूमिका — असेंबली बम कांड के अदृश्य नायक
बटुकेश्वर दत्त — इतिहास में जिनका नाम अक्सर भगत सिंह की छाया में दब जाता है, लेकिन असेंबली बम कांड में उनकी भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवंबर 1910 को बंगाल के बर्धमान ज़िले में हुआ था। वे HSRA के समर्पित सदस्य थे और भगत सिंह के घनिष्ठ मित्र। उन्होंने रसायन विज्ञान और बम-निर्माण में विशेष दक्षता प्राप्त की थी।[4]
स्वतंत्र भारत में उपेक्षित शहीद का साथी
असेंबली बम कांड के नायक बटुकेश्वर दत्त को स्वतंत्र भारत में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। 1965 में जब वे अस्पताल में थे, तब उन्होंने कहा — “जिस भारत के लिए हमने सब कुछ किया, उसने हमें भुला दिया।” 20 जुलाई 1965 को उनका निधन हुआ। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उन्हें उसी जगह दफनाया जाए जहाँ भगत सिंह को फाँसी दी गई थी।
स्रोत: Punjab Digital Library; National Archives of India — Batukeshwar Dutt Recordsचंद्रशेखर आज़ाद की भूमिका — असेंबली बम कांड के पर्दे के पीछे
चंद्रशेखर आज़ाद — HSRA के कमांडर-इन-चीफ — असेंबली बम कांड में सीधे तौर पर शामिल नहीं थे, लेकिन पर्दे के पीछे उनकी भूमिका अनिवार्य थी।
आज़ाद ने इस ऑपरेशन की अनुमति दी, उसकी योजना में भाग लिया और यह सुनिश्चित किया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी के बाद भी HSRA का संचालन जारी रहे। वे स्वयं असेंबली के आसपास के इलाके में थे — इमरजेंसी की स्थिति में कार्यवाही के लिए तैयार।[3]
असेंबली बम कांड के बाद जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त गिरफ्तार हो गए, तब चंद्रशेखर आज़ाद ने HSRA को जीवित रखने की कोशिश जारी रखी। लेकिन 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में वे भी शहीद हो गए। HSRA का आखिरी स्तंभ भी गिर गया।
क्रांतिकारियों का उद्देश्य — “बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है”
असेंबली बम कांड का उद्देश्य समझना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना घटना को समझना। यह उद्देश्य HSRA के घोषणापत्र में, भगत सिंह के अदालती बयानों में और भगवती चरण वोहरा के लेखन में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है।
“हम मनुष्यों की जानें लेने में विश्वास नहीं रखते। हमने बम उन लोगों को जगाने के लिए फेंका जो बहरे हो गए हैं।”— भगत सिंह, अदालत में बयान, 1929
HSRA के पर्चे में लिखा था — “It takes a thunderclap to make the deaf hear.” (बहरों को सुनाने के लिए बज्रपात जरूरी है।) यह वाक्य फ्रांसीसी अराजकतावादी विचारक Vaillant के प्रसिद्ध उद्धरण से प्रेरित था — किंतु HSRA ने इसे अपने भारतीय संदर्भ में एक नया अर्थ दिया।
गिरफ्तारी क्यों दी गई? — एक साहसी निर्णय का विश्लेषण
असेंबली बम कांड का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त भाग सकते थे — लेकिन उन्होंने भागना चुना नहीं। यह कोई कायरता नहीं थी, बल्कि एक सुविचारित रणनीतिक निर्णय था।[4]
भगत सिंह ने बाद में कहा — “फाँसी का फंदा मेरे लिए क्रांतिकारी का शृंगार है।” यह निर्भीकता केवल शब्दों में नहीं थी — इसे उन्होंने असेंबली बम कांड की रात से ही जीना शुरू कर दिया था।
अदालत में भगत सिंह का बयान — एक ऐतिहासिक दस्तावेज़
गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर दिल्ली की अदालत में मुकदमा चला। इस मुकदमे में भगत सिंह ने जो बयान दिए वे आज भारतीय राजनीतिक विचार के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं।[5]
हम आतंकवादी नहीं हैं: भगत सिंह ने स्पष्ट किया कि HSRA का उद्देश्य नागरिकों को भय दिखाना नहीं था। बम कम-शक्ति के थे, किसी को गंभीर चोट नहीं आई — यह जानबूझकर था।
ब्रिटिश दमन का विरोध: Public Safety Bill और Trade Disputes Bill भारतीय मज़दूरों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों पर हमला था। इसके विरोध में आवाज़ उठाना हर देशभक्त का कर्तव्य था।
क्रांति की परिभाषा: भगत सिंह ने कहा — “क्रांति का अर्थ केवल खून-खराबा नहीं है। इसका अर्थ है — वर्तमान व्यवस्था का मौलिक परिवर्तन।”
“क्रांति से हमारा अभिप्राय समाज की वर्तमान व्यवस्था में आमूल परिवर्तन है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी भी साधन का प्रयोग किया जा सकता है।”— भगत सिंह, अदालती बयान, दिल्ली, 1929
भगत सिंह के इन बयानों ने अदालत को एक असाधारण वैचारिक मंच में बदल दिया। देश भर के अखबारों ने इन्हें प्रमुखता से छापा। एक युवा क्रांतिकारी का यह साहस और वैचारिक स्पष्टता जनता के हृदय में उतर गई।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
असेंबली बम कांड ने ब्रिटिश प्रशासन को हिला दिया। सबसे सुरक्षित माने जाने वाले स्थान — केंद्रीय विधानसभा — में विस्फोट ने ब्रिटिश सुरक्षा-तंत्र की कमज़ोरियाँ उजागर कर दीं।[5]
देशभर की प्रतिक्रिया — असेंबली बम कांड का जन-प्रभाव
असेंबली बम कांड की खबर जैसे ही देश भर में फैली, जनप्रतिक्रिया तीव्र और विभाजित रही। एक तरफ HSRA के समर्थकों में उत्साह था, दूसरी तरफ गांधी और कांग्रेस के नेतृत्व ने हिंसा की निंदा की।
समाचार पत्रों की प्रतिक्रिया
असेंबली बम कांड भारत और विदेश के समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बना। मीडिया कवरेज ने HSRA के घोषणापत्र को वह व्यापक प्रचार दिलाया जो शायद किसी अन्य माध्यम से संभव नहीं होता।[5]
| Tribune (लाहौर) | असेंबली बम कांड को प्रमुखता से छापा। भगत सिंह के बयानों का विस्तृत प्रकाशन। |
| The Hindu | घटना की निंदा करते हुए भी HSRA के घोषणापत्र को प्रकाशित किया। |
| Hindustan Times | मुकदमे की सुनवाइयाँ नियमित रूप से छापीं। भगत सिंह के अदालती बयान प्रमुखता से। |
| Times of London | ब्रिटिश पाठकों को घटना से परिचित कराया। भारत में बढ़ते असंतोष पर चिंता व्यक्त की। |
| प्रताप (इलाहाबाद) | गणेश शंकर विद्यार्थी के नेतृत्व में असेंबली बम कांड को व्यापक कवरेज। HSRA के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रिपोर्टिंग। |
HSRA के पर्चों में जो संदेश था — “To Make the Deaf Hear” — वह अखबारों के माध्यम से करोड़ों भारतीयों तक पहुँचा। यही HSRA की असली जीत थी। असेंबली बम कांड के बाद भगत सिंह का नाम भारत के घर-घर में पहुँच गया।
लाहौर षड्यंत्र केस से संबंध — असेंबली बम कांड का दूरगामी परिणाम
लाहौर षड्यंत्र केस और असेंबली बम कांड — दोनों अलग-अलग घटनाएँ थीं, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इन्हें एक साथ जोड़ दिया। सांडर्स वध और असेंबली बम कांड के आरोपी एक ही HSRA संगठन के सदस्य थे — इसलिए ब्रिटिश अभियोजन पक्ष ने दोनों को लाहौर षड्यंत्र केस में शामिल किया।[5]
इस जुड़ाव के कारण असेंबली बम कांड के आरोपी भगत सिंह के खिलाफ सांडर्स वध का मामला भी जुड़ गया। परिणामस्वरूप भगत सिंह को जो मृत्युदंड मिला, उसमें केवल सांडर्स वध नहीं, बल्कि लाहौर षड्यंत्र केस की पूरी श्रृंखला शामिल थी।
सांडर्स वध से संबंध — कारण-कार्य श्रृंखला
साइमन कमीशन विरोध (1927-28) → लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज (30 अक्ट 1928) → लाला जी का निधन (17 नवं 1928) → सांडर्स वध (17 दिसं 1928) → HSRA की Public Safety Bill के विरुद्ध योजना → असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929) → गिरफ्तारी, भूख हड़ताल → लाहौर षड्यंत्र केस → 23 मार्च 1931 की फाँसी
सांडर्स वध (दिसंबर 1928) और असेंबली बम कांड (अप्रैल 1929) — दोनों HSRA की उसी क्रांतिकारी योजना के हिस्से थे जो साइमन कमीशन विरोध और लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद गति में आई थी। पहली घटना बदले की भावना से प्रेरित थी, दूसरी राजनीतिक विरोध और जनचेतना जागृति के लिए।
असेंबली बम कांड के बाद HSRA — संगठन का भविष्य
असेंबली बम कांड HSRA के शिखर की घटना थी — इसके बाद संगठन तेज़ी से कमज़ोर पड़ने लगा। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी ने HSRA को उसके दो सबसे प्रभावशाली नेताओं से वंचित कर दिया।[2]
चंद्रशेखर आज़ाद ने HSRA को ज़िंदा रखने की हर कोशिश की। भगवती चरण वोहरा ने “Philosophy of the Bomb” लिखकर संगठन को वैचारिक आधार दिया। भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की एक योजना भी बनी — लेकिन वोहरा की बम परीक्षण में मृत्यु (मई 1930) ने उसे विफल कर दिया।
मिथक बनाम तथ्य — असेंबली बम कांड के बारे में भ्रांतियाँ
| ❌ मिथक / भ्रांति | ✅ ऐतिहासिक तथ्य |
|---|---|
| असेंबली बम कांड में कई लोग मारे गए। | असेंबली बम कांड में कोई नहीं मारा गया। बम जानबूझकर कम-शक्ति के बनाए गए थे। कुछ लोगों को मामूली चोटें आईं। |
| भगत सिंह भागने की कोशिश करते समय पकड़े गए। | भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जानबूझकर गिरफ्तारी दी। गिरफ्तारी उनकी योजना का हिस्सा था। वे अदालत को अपने विचारों का मंच बनाना चाहते थे। |
| असेंबली बम कांड एक आतंकवादी हमला था। | HSRA ने स्पष्ट किया कि यह एक राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन था। बम का उद्देश्य हत्या नहीं, बल्कि “बहरी” सत्ता को जगाना था। |
| भगत सिंह अकेले थे — HSRA की कोई भूमिका नहीं। | असेंबली बम कांड HSRA की सुविचारित और सामूहिक योजना थी। आज़ाद, सुखदेव, वोहरा सभी इसमें शामिल थे। |
| असेंबली बम कांड विफल रहा। | HSRA के उद्देश्य के अनुसार — जनचेतना जागृत करना और HSRA की विचारधारा को राष्ट्रीय मंच देना — यह पूरी तरह सफल रहा। भगत सिंह भारत के सबसे लोकप्रिय नायक बन गए। |
| बटुकेश्वर दत्त ने बाद में माफी माँगी और रिहा हो गए। | बटुकेश्वर दत्त ने कोई माफी नहीं माँगी। उन्हें आजीवन कारावास हुआ। वे अंडमान भेजे गए और 1938 में जनता के दबाव पर रिहा किए गए। |
स्वतंत्रता आंदोलन पर असेंबली बम कांड का प्रभाव
असेंबली बम कांड का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक था। यह केवल एक घटना नहीं थी — यह एक ऐसा प्रतीक बन गई जिसने पूरी एक पीढ़ी को प्रेरित किया।
असेंबली बम कांड HSRA की सबसे सफल राजनीतिक कार्रवाई थी — इसीलिए नहीं कि इसमें कोई बड़ी क्षति हुई, बल्कि इसीलिए कि इसने जो लक्ष्य तय किए थे, उन्हें पूरा किया। HSRA ने अदालत को प्रचार मंच बनाया, भगत सिंह राष्ट्रीय नायक बने और “इंकलाब ज़िंदाबाद” भारत का सर्वप्रिय नारा बन गया।
इतिहासकार बिपन चंद्र के अनुसार, असेंबली बम कांड ने HSRA को एक स्थानीय क्रांतिकारी समूह से उठाकर भारत के राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।
असेंबली बम कांड की विरासत — 90 वर्ष बाद भी जीवंत
आज जब भारत की संसद में विरोध होता है, जब युवा “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा लगाते हैं, जब कोई भगत सिंह का नाम लेता है — तो वह अनजाने में ही 8 अप्रैल 1929 की उस दोपहर की याद जीवित रखता है।
60 सेकंड में असेंबली बम कांड — Voice Search के लिए
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में दो बम फेंके। यह असेंबली बम कांड था।
बम कम-शक्ति के थे — कोई नहीं मारा गया। यह हत्या नहीं, विरोध था। ब्रिटिश सरकार के दमनकारी Public Safety Bill के खिलाफ।
दोनों ने “इंकलाब ज़िंदाबाद” के नारे लगाए और जानबूझकर गिरफ्तारी दी। भागे नहीं।
उनका उद्देश्य था — “बहरों को सुनाने के लिए धमाका।” यानी जो सत्ता जनता की आवाज़ नहीं सुनती, उसे जगाना।
इसके बाद लाहौर षड्यंत्र केस चला। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी हुई। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास।
असेंबली बम कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे साहसी और प्रतीकात्मक घटनाओं में से एक है।
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FAQ — असेंबली बम कांड के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
निष्कर्ष — असेंबली बम कांड: एक अमर विरोध का स्मरण
असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे साहसी और वैचारिक रूप से परिपक्व क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने HSRA के निर्देश पर दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में दो कम-शक्ति के बम फेंके — उद्देश्य हत्या नहीं, विरोध था। दोनों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी और अदालत को अपने विचारों का मंच बनाया। यह घटना केवल एक विस्फोट नहीं थी — यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सामने एक नैतिक चुनौती थी।
8 अप्रैल 1929 की वह दोपहर — जब एक 21-22 वर्ष के युवक ने ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे सुरक्षित स्थान पर खड़े होकर “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा लगाया — आज भी भारतीय चेतना में जीवित है।
असेंबली बम कांड हमें यह सिखाता है कि प्रतिरोध का अर्थ केवल हथियार नहीं होता — यह एक विचार भी हो सकता है, एक नारा भी, एक बयान भी। भगत सिंह ने बम से जितना किया, उससे अधिक अपने अदालती बयानों से किया। उन्होंने एक ऐसी पीढ़ी को जन्म दिया जो यह मानती थी कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक भी होनी चाहिए।
चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत, भगवती चरण वोहरा की कुर्बानी, दुर्गा भाभी का साहस, सुखदेव और राजगुरु की निर्भीकता — ये सब मिलकर HSRA की उस विरासत के हिस्से हैं जिसे असेंबली बम कांड ने राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।
2026 में — जब लोकतंत्र, श्रम अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्न फिर से प्रासंगिक हैं — असेंबली बम कांड की विरासत हमसे यह प्रश्न पूछती है: क्या हम उस भारत के लिए काम कर रहे हैं जिसके लिए भगत सिंह हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर चढ़ गए?
स्रोत एवं संदर्भ
- National Archives of India — Central Legislative Assembly Bomb Case Records (1929); Lahore Conspiracy Case Files, New Delhi
- Manmathnath Gupta, They Lived Dangerously: Reminiscences of a Revolutionary (People’s Publishing House, 1969)
- Nehru Memorial Museum & Library — HSRA Documents, Saunders Case Files, Delhi
- Chaman Lal (Ed.), Bhagat Singh: The Jail Notebook and Other Writings (Leftword Books, 2007)
- British Library, India Office Records — Central Legislative Assembly Bombing, Lahore Conspiracy Case Trial Proceedings (1929–1931)
- Bipan Chandra, India’s Struggle for Independence (Penguin Books, 1989) — Chapter on Revolutionary Terrorism
- Encyclopaedia Britannica — Bhagat Singh; Indian Independence Movement
- Punjab Digital Library — Batukeshwar Dutt Records; HSRA Documents
- Gandhi Heritage Portal — Simon Commission Protests (1927–28)
- Ajay Kumar Agrawal, The Revolutionary Bhagat Singh (National Book Trust, India)
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अंतिम अपडेट: जून 2026 | स्रोत सत्यापन और संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित


