सांडर्स वध (1928)
सांडर्स वध 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में हुई वह ऐतिहासिक क्रांतिकारी कार्रवाई थी जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी J.P. Saunders को गोली मारी। यह कार्रवाई लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए HSRA द्वारा की गई थी। लाला जी साइमन कमीशन विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुए थे और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हुआ था।
- क्या: ब्रिटिश पुलिस अधिकारी J.P. Saunders की हत्या — लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध
- कब: 17 दिसंबर 1928, सायंकाल
- कहाँ: लाहौर पुलिस अधीक्षक कार्यालय के बाहर, लाहौर (अविभाजित भारत)
- क्यों: 30 अक्टूबर 1928 के लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला; Scott को दंडित करने की योजना में गलत पहचान से Saunders निशाने पर आए
- कौन: भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, जय गोपाल (HSRA)
- परिणाम: लाहौर षड्यंत्र केस, असेंबली बम कांड, और अंततः 23 मार्च 1931 को तीनों की फाँसी
सांडर्स वध क्या था?
सांडर्स वध 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में HSRA के क्रांतिकारियों द्वारा की गई वह कार्रवाई थी जिसमें ब्रिटिश पुलिस सहायक अधीक्षक John Poyntz Saunders को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लिया गया। इस कार्रवाई में भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव थापर और जय गोपाल ने भाग लिया।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो एक युग को परिभाषित कर देती हैं। सांडर्स वध ऐसी ही एक घटना है। यह केवल एक पुलिस अधिकारी की हत्या नहीं थी — यह उस ब्रिटिश साम्राज्य को एक सीधी चुनौती थी जिसने एक 63 वर्षीय राष्ट्रनायक लाला लाजपत राय को सड़क पर लाठियों से पिटवाया था।
1928 का भारत एक उबलते हुए बर्तन की तरह था। साइमन कमीशन का विरोध पूरे देश में हो रहा था। लाहौर में जब राष्ट्रवादी जुलूस पर लाठियाँ बरसाई गईं और लाला लाजपत राय की मृत्यु हुई, तो HSRA के युवा क्रांतिकारियों ने मौन रहना अस्वीकार कर दिया। सांडर्स वध उसी संकल्प की परिणति थी।[1]
इस एक कार्रवाई ने भारतीय राजनीति को बदल दिया। इसने भगत सिंह को एक राष्ट्रीय नायक बनाया, लाहौर षड्यंत्र केस की नींव रखी और अंततः 23 मार्च 1931 की उस शहादत का मार्ग प्रशस्त किया जो भारतीय इतिहास की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक है।
सांडर्स वध — त्वरित तथ्य
| घटना | सांडर्स वध (Saunders Assassination) |
| तारीख | 17 दिसंबर 1928 |
| स्थान | लाहौर पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सामने, लाहौर (अविभाजित भारत) |
| लक्ष्य (मूल) | J.A. Scott — लाहौर पुलिस अधीक्षक |
| वास्तविक शिकार | J.P. Saunders — सहायक पुलिस अधीक्षक (ASP) |
| कारण | 30 अक्टूबर 1928 के लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला |
| संगठन | HSRA — हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन |
| प्रमुख प्रतिभागी | भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव थापर, जय गोपाल |
| परिणाम | लाहौर षड्यंत्र केस, असेंबली बम कांड, 23 मार्च 1931 की फाँसी |
| पलायन सहयोग | दुर्गा भाभी, भगवती चरण वोहरा |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — सांडर्स वध से पहले का भारत
सांडर्स वध को समझने के लिए 1920 के दशक के उत्तरार्ध के राजनीतिक परिदृश्य को समझना आवश्यक है। 1927 में HSRA के पूर्ववर्ती संगठन HRA के वरिष्ठ नेताओं — राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह — को काकोरी कांड के बाद फाँसी दी जा चुकी थी। चंद्रशेखर आज़ाद ने भूमिगत रहते हुए संगठन को पुनर्जीवित किया था और 1928 में HSRA का गठन हुआ था।[1]
उसी वर्ष नवंबर 1927 में ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन की घोषणा की — एक ऐसा आयोग जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था और जिसका काम था भारत के संवैधानिक सुधारों की जाँच करना। इस घोर अपमान ने पूरे देश को आक्रोश से भर दिया।
सांडर्स वध केवल एक व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था। यह उस व्यापक क्रांतिकारी रणनीति का हिस्सा था जिसे HSRA ने अपनाया था — लक्षित कार्रवाइयाँ जो ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती दें और जनता में क्रांतिकारी चेतना जगाएँ। लाला लाजपत राय की मृत्यु ने इस कार्रवाई को नैतिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर अनिवार्य बना दिया।
1928 वह वर्ष था जब भगत सिंह महज़ 21 वर्ष के थे — एक ऐसी उम्र जिसमें अधिकतर युवा अभी जीवन की शुरुआत करते हैं। किंतु उन्होंने और उनके साथियों ने अपना सब कुछ देश को अर्पित कर दिया था।
साइमन कमीशन और विरोध प्रदर्शन
साइमन कमीशन (Simon Commission) 1927 में ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित एक संवैधानिक जाँच समिति थी जिसमें सात ब्रिटिश सांसद थे और एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इस आयोग का भारत आगमन 3 फरवरी 1928 को हुआ और इसके विरोध में पूरे भारत में “साइमन गो बैक” के नारों के साथ प्रदर्शन हुए।
नवंबर 1927 में घोषित साइमन कमीशन ने भारतीय जनता को गहरा आघात पहुँचाया। यह आयोग यह तय करने के लिए भेजा गया था कि भारत को और कितना स्वशासन मिलना चाहिए — लेकिन इसमें किसी भारतीय को शामिल नहीं किया गया। यह अपमान सभी राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों को एक साथ सड़क पर ले आया।[2]
3 फरवरी 1928 को जब आयोग बंबई पहुँचा, देशभर में हड़ताल और प्रदर्शन हुए। हर शहर में “साइमन गो बैक” के नारे गूँजे। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और क्रांतिकारी संगठनों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया — यह उस युग का एक दुर्लभ राजनीतिक एकता का दृश्य था।
लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज — सांडर्स वध की प्रत्यक्ष पृष्ठभूमि
30 अक्टूबर 1928 — यह वह दिन था जो सांडर्स वध की नींव रखेगा। लाहौर रेलवे स्टेशन पर साइमन कमीशन के आगमन के विरोध में एक विशाल जुलूस निकाला गया। इसका नेतृत्व कर रहे थे पंजाब के शेर, 63 वर्षीय राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय।[2]
जुलूस शांतिपूर्ण था। लेकिन लाहौर के पुलिस अधीक्षक J.A. Scott ने आदेश दिया कि भीड़ को तितर-बितर किया जाए। पुलिस ने क्रूर लाठीचार्ज शुरू किया। इस क्रूरता का सबसे बड़ा शिकार स्वयं लाला लाजपत राय बने — उन्हें सिर और छाती पर कई लाठियाँ पड़ीं।
लाला जी की अंतिम चेतावनी
लाठियाँ सहते हुए भी लाला लाजपत राय ने जो शब्द कहे वे इतिहास में अमर हो गए। उन्होंने कहा था — “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की एक-एक कील होगी।” यह उद्धरण उस काल के समाचारपत्रों और प्रत्यक्षदर्शी विवरणों में दर्ज है।
स्रोत: Punjab Digital Library — Contemporary Newspaper Records, 1928; Nehru Memorial Museum & Libraryलाठीचार्ज की ख़बर पूरे देश में आग की तरह फैल गई। भगत सिंह स्वयं उस जुलूस में मौजूद थे और उन्होंने अपनी आँखों से यह क्रूरता देखी थी। HSRA के लिए यह घटना केवल एक राजनीतिक समाचार नहीं थी — यह एक व्यक्तिगत आघात था।
लाला लाजपत राय की मृत्यु — राष्ट्र का शोक
लाला लाजपत राय 30 अक्टूबर 1928 के लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल हुए। सिर और छाती पर लाठियाँ पड़ने से उनकी शारीरिक स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई। 17 नवंबर 1928 को लाहौर में उनका निधन हो गया। वे 63 वर्ष के थे। उनकी मृत्यु ने सारे देश को शोक में डुबो दिया और सांडर्स वध की नींव रखी।
30 अक्टूबर के लाठीचार्ज के बाद लाला लाजपत राय की हालत बिगड़ती रही। उन्होंने कुछ दिन अपने कर्तव्य और भाषण जारी रखे, लेकिन आंतरिक चोटें गहरी थीं। 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया।[2]
भारत ने एक ऐसे नेता को खो दिया जो बाल गंगाधर तिलक के समकालीन थे, जिन्होंने पंजाब की राजनीति को एक नई दिशा दी थी, जिन्हें “पंजाब केसरी” की उपाधि मिली थी। उनकी मृत्यु एक साधारण मृत्यु नहीं थी — यह एक राजनीतिक हत्या थी, चाहे कानून की किताब में यह दर्ज हो या न हो।
ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक तौर पर कभी नहीं माना कि लाला लाजपत राय की मृत्यु लाठीचार्ज के कारण हुई। Scott ने अदालत में कहा कि उसने केवल क़ानून-व्यवस्था बनाए रखी। लेकिन लाखों भारतीयों की दृष्टि में — और HSRA की दृष्टि में — यह हत्या ही थी जिसका जवाब देना था।
लाला लाजपत राय की मृत्यु की ख़बर ने भगत सिंह और उनके साथियों को अंदर तक हिला दिया। वे तय कर चुके थे — इस अपमान का उत्तर देना होगा। Scott को दंडित करना होगा।
HSRA की प्रतिक्रिया और बदले का निर्णय
लाला लाजपत राय की मृत्यु के तुरंत बाद HSRA के नेतृत्व ने एक आपात बैठक की। चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और सुखदेव थापर ने मिलकर निर्णय लिया — J.A. Scott को दंडित किया जाएगा जिसने लाठीचार्ज का आदेश दिया था।[3]
यह निर्णय सोच-समझकर लिया गया था। HSRA की विचारधारा में प्रतीकात्मक और लक्षित कार्रवाइयों को महत्व दिया जाता था। Scott का नाम इसलिए तय किया गया क्योंकि उसने सीधे लाठीचार्ज का आदेश दिया था। अंधाधुंध हिंसा HSRA की नीति नहीं थी।
योजना कैसे बनी?
सांडर्स वध की योजना अत्यंत सावधानीपूर्वक बनाई गई। सुखदेव थापर ने योजना का खाका तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई। कई दिनों तक लाहौर पुलिस मुख्यालय के आसपास निगरानी की गई। Scott की दिनचर्या, उसके आने-जाने के समय, उसके वाहन और सुरक्षा व्यवस्था का अध्ययन किया गया।[3]
जय गोपाल को यह जिम्मेदारी दी गई कि वे Scott की पहचान करके बाकी टीम को संकेत दें। राजगुरु को पहली गोली चलाने की भूमिका दी गई। भगत सिंह पुष्टिकारक निशानेबाज़ के रूप में थे। चंद्रशेखर आज़ाद पास की दीवार पर तैनात थे ताकि किसी बाधा की स्थिति में कवर फायर दे सकें।
सांडर्स वध से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारी
17 दिसंबर 1928 को लाहौर में हुए सांडर्स वध ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी। यह कार्रवाई हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) द्वारा लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से की गई थी। इस अभियान में कई क्रांतिकारियों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भगत सिंह
सांडर्स वध अभियान के प्रमुख योजनाकारों में से एक। लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने इस कार्रवाई में प्रत्यक्ष भाग लिया।
पूरा जीवन परिचय →
शिवराम हरि राजगुरु
राजगुरु ने सांडर्स पर पहली गोली चलाई थी। अपनी अद्भुत निशानेबाजी के कारण वे HSRA के सबसे कुशल क्रांतिकारियों में गिने जाते थे।
पूरा जीवन परिचय →
चंद्रशेखर आज़ाद
ऑपरेशन के संरक्षक और HSRA के कमांडर। उन्होंने पूरी योजना का नेतृत्व किया तथा क्रांतिकारियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की।
पूरा जीवन परिचय →क्या स्कॉट असली लक्ष्य था? — गलत पहचान की कहानी
हाँ, HSRA का मूल लक्ष्य J.A. Scott था — वह पुलिस अधीक्षक जिसने लाठीचार्ज का आदेश दिया था। लेकिन 17 दिसंबर 1928 को जय गोपाल ने J.P. Saunders को गलती से Scott समझ लिया और संकेत दिया। इस गलत पहचान के कारण Saunders सांडर्स वध का शिकार बने। Scott उस दिन अलग रास्ते से गया था।
यह सांडर्स वध का वह पहलू है जो इतिहासकारों और सामान्य पाठकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। HSRA का मूल निशाना Scott था। लेकिन 17 दिसंबर की शाम को जय गोपाल ने जो व्यक्ति पुलिस मुख्यालय से मोटरसाइकिल पर निकलते देखा, वह J.P. Saunders था — ASP (Assistant Superintendent of Police)।[3]
जय गोपाल ने उसे Scott समझकर संकेत दे दिया। राजगुरु ने गोली चला दी। बाद में जब पता चला कि वह Scott नहीं, Saunders था — तो HSRA ने उस कार्रवाई की नैतिक जिम्मेदारी ली और एक पोस्टर जारी किया जिसमें कहा गया — “हमें खेद है कि Saunders Scott नहीं था, लेकिन लाला लाजपत राय के हत्यारों को दंड मिलना आवश्यक था।”
J.P. Saunders उस लाठीचार्ज में व्यक्तिगत रूप से शामिल था या नहीं — इस पर इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ स्रोत बताते हैं कि वह उस दिन लाठीचार्ज में शामिल पुलिसकर्मियों में से एक था। किंतु मुख्य लक्ष्य Scott था जो उस दिन बच गया। Saunders की मृत्यु एक दुखद गलत पहचान का परिणाम थी — हालांकि HSRA ने इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह स्वीकार की।
सांडर्स वध की पूरी घटना — 17 दिसंबर 1928
17 दिसंबर 1928 की शाम — लाहौर के पुलिस मुख्यालय के बाहर। भगत सिंह, राजगुरु और जय गोपाल अपनी-अपनी जगह तैनात थे। चंद्रशेखर आज़ाद पास की दीवार पर पिस्तौल लिए निगरानी कर रहे थे।[3]
शाम को J.P. Saunders मोटरसाइकिल पर पुलिस मुख्यालय से बाहर निकले। जय गोपाल ने उन्हें Scott समझकर संकेत दिया। राजगुरु ने पहली गोली चलाई जो Saunders को लगी। वे मोटरसाइकिल से गिर पड़े। भगत सिंह ने आगे बढ़कर पुष्टि करते हुए और गोलियाँ चलाईं।
इस दौरान एक भारतीय पुलिस कांस्टेबल चनन सिंह ने पीछा किया। चंद्रशेखर आज़ाद ने उसे रोकने की कोशिश की और चेतावनी दी — लेकिन जब चनन सिंह नहीं रुका तो आज़ाद को गोली चलानी पड़ी। चनन सिंह की भी मृत्यु हो गई।
चनन सिंह की मृत्यु एक दुखद पहलू है जिसे इतिहास में अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है। वह एक भारतीय था — ब्रिटिश साम्राज्य का सेवक, लेकिन अपने ही देशवासियों के विरुद्ध खड़ा। भगत सिंह ने बाद में अपने लेखन में इस पर पीड़ा व्यक्त की थी।
कार्रवाई के तुरंत बाद सभी क्रांतिकारी तेज़ी से वहाँ से निकल गए। पुलिस मुख्यालय के पास होने के बावजूद वे सफलतापूर्वक भाग निकले — यह HSRA की सांगठनिक दक्षता का प्रमाण था।
17 दिसंबर 1928 की विस्तृत टाइमलाइन
भगत सिंह की भूमिका — सांडर्स वध में
भगत सिंह सांडर्स वध के मुख्य आयोजकों में से एक थे। वे योजना बनाने से लेकर उसे अंजाम देने तक हर चरण में शामिल थे। 17 दिसंबर को उनकी भूमिका थी — राजगुरु के बाद पुष्टिकारक निशानेबाज़ के रूप में। जब Saunders गिरे, भगत सिंह ने आगे बढ़कर सुनिश्चित किया कि कार्रवाई पूरी हो गई है।[3]
सांडर्स वध के बाद भगत सिंह ने दाढ़ी काटी, पगड़ी हटाई और अंग्रेज़ी पोशाक धारण की। दुर्गा भाभी के साथ पत्नी-पति के रूप में ट्रेन से लाहौर से निकले। यह भेष बदलने की क्षमता और मानसिक शांति — दोनों उनके असाधारण व्यक्तित्व के प्रमाण हैं।
राजगुरु की भूमिका — पहली गोली
शिवराम हरि राजगुरु HSRA के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाज़ों में से एक थे। सांडर्स वध में उन्हें “फर्स्ट शूटर” की भूमिका दी गई थी — यानी पहली गोली उन्हें ही चलानी थी। जय गोपाल का संकेत मिलते ही राजगुरु ने बिना हिचकिचाए गोली चलाई।[3]
राजगुरु का नाम सांडर्स वध के साथ इतना जुड़ा है कि इतिहास में यह घटना “राजगुरु सांडर्स वध” के नाम से भी जानी जाती है। वे महाराष्ट्र के पुणे जिले के रहने वाले थे, किंतु लाहौर आकर HSRA में शामिल हुए। उनका समर्पण और साहस असाधारण था।
चंद्रशेखर आज़ाद की भूमिका — अजेय सेनापति
चंद्रशेखर आज़ाद HSRA के कमांडर-इन-चीफ के रूप में सांडर्स वध की पूरी कार्रवाई के सर्वोच्च नियंत्रक थे। घटना के दिन वे पास की एक दीवार पर पिस्तौल लेकर तैनात थे — ताकि यदि कोई बाधा आए तो कवर फायर दे सकें।[2]
जब चनन सिंह ने पीछा किया, आज़ाद ने पहले उसे रुकने की चेतावनी दी। लेकिन चनन सिंह नहीं रुका और आज़ाद को गोली चलानी पड़ी। पूरी कार्रवाई के बाद आज़ाद ने भी सफलतापूर्वक पलायन किया। उनकी उपस्थिति ने पूरी टीम को मनोबल और सुरक्षा दोनों प्रदान की।
सुखदेव थापर की भूमिका — योजना का वास्तुकार
सुखदेव थापर सांडर्स वध की योजना बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में थे। वे HSRA के सांगठनिक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे जो हर कार्रवाई की विस्तृत रूपरेखा तैयार करते थे। Scott की दिनचर्या का अध्ययन, पुलिस मुख्यालय की टोही और पलायन मार्ग की तैयारी — इन सबमें सुखदेव की केंद्रीय भूमिका थी।[3]
घटना के दिन सुखदेव स्वयं घटनास्थल पर नहीं थे — वे पर्दे के पीछे से सांगठनिक समन्वय कर रहे थे। यही उनकी भूमिका थी — सेनापति नहीं, बल्कि वह रणनीतिकार जो युद्ध के मैदान में हर सैनिक को उसकी जगह पहुँचाता है।
जय गोपाल की भूमिका — और बाद में विश्वासघात
जय गोपाल सांडर्स वध में एक महत्वपूर्ण लेकिन विवादास्पद भूमिका में थे। उन्हें Scott की पहचान करके बाकी टीम को संकेत देने का काम सौंपा गया था। उन्होंने J.P. Saunders को Scott समझकर संकेत दिया — जो बाद में गलत साबित हुआ।[3]
जय गोपाल का सांडर्स वध में गलत संकेत देना एक गलती थी। लेकिन उनका सबसे बड़ा “योगदान” बाद में आया — जब लाहौर षड्यंत्र केस में उन्होंने सरकारी गवाह बनकर भगत सिंह और साथियों के विरुद्ध गवाही दी। इस विश्वासघात ने लाहौर षड्यंत्र केस में ब्रिटिश सरकार को मज़बूत सबूत दिए और भगत सिंह की फाँसी को अनिवार्य बना दिया।
घटना के बाद क्या हुआ?
सांडर्स वध के तुरंत बाद लाहौर में हलचल मच गई। पुलिस मुख्यालय के ठीक सामने एक अधिकारी की हत्या — यह अभूतपूर्व था। ब्रिटिश पुलिस ने तत्काल पूरे शहर में नाकेबंदी कर दी। रेलवे स्टेशनों, सड़कों और नाकों पर सख्त चेकिंग शुरू हुई।[4]
लेकिन तब तक क्रांतिकारी लाहौर की सीमाओं को पार कर चुके थे। HSRA की सांगठनिक दक्षता ने पलायन को संभव बनाया। अगले कुछ घंटों में भगत सिंह, राजगुरु और आज़ाद अलग-अलग रास्तों से लाहौर छोड़ चुके थे।
इसके साथ ही HSRA ने लाहौर की दीवारों पर पोस्टर चिपकाए जिसमें कार्रवाई की जिम्मेदारी ली गई और कहा गया कि यह लाला लाजपत राय की हत्या का बदला था। यह पोस्टर राजनीतिक संवाद का एक हथियार था।
भगत सिंह का भेष बदलकर निकलना
सांडर्स वध के बाद भगत सिंह ने दाढ़ी काटकर, पगड़ी हटाकर और अंग्रेज़ी सूट-हैट पहनकर पूरी तरह बदला हुआ रूप धारण किया। दुर्गा भाभी उनकी “पत्नी” और उनके छोटे पुत्र उनके “बच्चे” के रूप में साथ थे। भगवती चरण वोहरा उनके “नौकर” के रूप में। इस तरह वे ट्रेन से लाहौर से लखनऊ निकल गए।
यह पलायन सांडर्स वध जितनी ही साहसिक और चतुराईपूर्ण घटना है। पूरे लाहौर में पुलिस नाकाबंदी थी। हर सिख युवक को रोककर पूछताछ हो रही थी। ऐसे में एक दाढ़ीधारी सिख युवक को रात भर में “अंग्रेज़” में बदल देना — यह असाधारण मानसिक शक्ति और त्वरित बुद्धि का परिचय था।[4]
ट्रेन में भगत सिंह और दुर्गा भाभी
ट्रेन में अंग्रेज़ी पोशाक में बैठे भगत सिंह के पास से पुलिस अधिकारी गुज़रे — लेकिन उन्हें पहचान नहीं पाए। यह दृश्य ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत नाटकीय है। वह युवक जिस पर पूरी ब्रिटिश पुलिस की नज़र थी, वह एक “अंग्रेज़ सज्जन” के रूप में उनके सामने से निकल गया।
स्रोत: Manmathnath Gupta, They Lived Dangerously; National Archives of India — Lahore Conspiracy Case Documentsदुर्गा भाभी की भूमिका — सांडर्स वध की अनसुनी नायिका
दुर्गा भाभी — यानी दुर्गा देवी वोहरा — भगवती चरण वोहरा की पत्नी और HSRA की सबसे साहसी महिला सदस्य। सांडर्स वध के बाद की सबसे जोखिम भरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी — भगत सिंह को लाहौर से सुरक्षित बाहर निकालना।[4]
उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के हाँ कह दिया। रात भर में भगत सिंह का रूप बदला। सुबह वे एक सामान्य अंग्रेज़ परिवार की तरह लाहौर रेलवे स्टेशन पहुँचे — दुर्गा भाभी “मेम साहब”, भगत सिंह “साहब”, भगवती चरण वोहरा “नौकर” और दुर्गा भाभी का छोटा बेटा “बच्चा”।
“दुर्गा भाभी ने उस रात जो किया, वह किसी भी योद्धा की शौर्यगाथा से कम नहीं था। एक माँ, एक पत्नी, एक क्रांतिकारी — तीनों एक साथ।”— ऐतिहासिक मूल्यांकन
दुर्गा भाभी की भूमिका को अक्सर इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं। सांडर्स वध की सफलता केवल गोलियाँ चलाने वालों की नहीं थी — उन लोगों की भी थी जिन्होंने बाद में क्रांतिकारियों को सुरक्षित निकाला।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
सांडर्स वध ने ब्रिटिश प्रशासन को गहरे सदमे में डाल दिया। पंजाब सरकार ने तत्काल जाँच के आदेश दिए। पूरे लाहौर में सख्त पुलिस पहरा लगाया गया। संदिग्धों की गिरफ्तारियाँ शुरू हुईं। ब्रिटिश वायसराय ने इसे एक “कायरतापूर्ण और बर्बर हत्या” करार दिया।[4]
लेकिन ब्रिटिश सरकार की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अपराधी मिल नहीं रहे थे। महीनों तक खोजबीन के बावजूद सांडर्स वध के आरोपियों का कोई सुराग नहीं था। यह HSRA की संगठनात्मक सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण था।
स्थिति तब बदली जब असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929) के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी। तब ब्रिटिश पुलिस ने सांडर्स वध से संबंध जोड़कर लाहौर षड्यंत्र केस बनाया।
लाहौर षड्यंत्र केस से संबंध
लाहौर षड्यंत्र केस का मुख्य आधार सांडर्स वध था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर J.P. Saunders की हत्या का मुकदमा चला। जय गोपाल की सरकारी गवाही और अन्य सबूतों के आधार पर तीनों को 7 अक्टूबर 1930 को मृत्युदंड दिया गया और 23 मार्च 1931 को फाँसी दी गई।
लाहौर षड्यंत्र केस में ब्रिटिश सरकार ने एक विशेष ट्रिब्यूनल बनाया क्योंकि नियमित अदालत में मामला खींचने का ख़तरा था। इस ट्रिब्यूनल में जूरी नहीं थी और आरोपियों की अनुपस्थिति में भी सुनवाई हो सकती थी।[4]
असेंबली बम कांड से संबंध — सांडर्स वध के बाद का अध्याय
सांडर्स वध के बाद भगत सिंह और HSRA भूमिगत थे। लेकिन 8 अप्रैल 1929 को उन्होंने एक और ऐतिहासिक कदम उठाया — असेंबली बम कांड। दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दो कम शक्तिशाली बम फेंके और HSRA के पर्चे बिखेरे।[5]
महत्वपूर्ण यह है कि इस बार उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की। उन्होंने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी। यह निर्णय भगत सिंह की सोची-समझी रणनीति थी — जेल को और अदालत को राजनीतिक प्रचार का मंच बनाना। इसी गिरफ्तारी ने ब्रिटिश पुलिस को सांडर्स वध से भगत सिंह का संबंध जोड़ने और लाहौर षड्यंत्र केस बनाने का अवसर दिया।
लाला लाजपत राय की मृत्यु → सांडर्स वध → HSRA की प्रसिद्धि → असेंबली बम कांड → लाहौर षड्यंत्र केस → 23 मार्च 1931 की शहादत — यह एक अटूट श्रृंखला है जिसकी पहली कड़ी सांडर्स वध थी।
मिथक बनाम तथ्य — सांडर्स वध
| मिथक / भ्रांति | ऐतिहासिक तथ्य |
|---|---|
| Saunders HSRA का असली लक्ष्य था। | नहीं। असली लक्ष्य J.A. Scott था — लाठीचार्ज का आदेश देने वाला SP। Saunders को Scott समझकर गलत पहचान में मारा गया। |
| भगत सिंह ने पहली गोली चलाई। | पहली गोली राजगुरु ने चलाई। भगत सिंह ने बाद में पुष्टि के लिए गोलियाँ चलाईं। |
| सांडर्स वध एक आतंकी घटना थी। | HSRA ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध की लक्षित कार्रवाई माना। यह उस लाठीचार्ज का जवाब था जिसने एक राष्ट्रनेता की जान ली। |
| भगत सिंह अकेले लाहौर से भागे। | दुर्गा भाभी और भगवती चरण वोहरा की मदद से वे एक परिवार के रूप में ट्रेन से निकले। यह सांगठनिक प्रयास था। |
| सांडर्स वध के बाद भगत सिंह तुरंत पकड़े गए। | वे लगभग चार महीने बाद असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929) के बाद स्वेच्छा से पकड़े गए। |
| लाला लाजपत राय की मृत्यु सीधे लाठीचार्ज से हुई। | लाठीचार्ज (30 अक्टूबर) और मृत्यु (17 नवंबर) के बीच 18 दिन का अंतर था। चोटें गहरी थीं किंतु मृत्यु का सीधा कारण ब्रिटिश सरकार ने कभी स्वीकार नहीं किया। |
स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव
सांडर्स वध का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव बहुआयामी और दूरगामी था। इस घटना ने न केवल एक पुलिस अधिकारी को दंडित किया — इसने पूरे राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा और गति को प्रभावित किया।[5]
सांडर्स वध ने गांधी के नेतृत्व में चल रहे अहिंसक आंदोलन और क्रांतिकारी धारा के बीच के तनाव को भी उजागर किया। गांधी जी ने इस कार्रवाई की निंदा की, जबकि लाखों युवाओं ने इसे वीरता का प्रतीक माना। यह तनाव भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
सांडर्स वध की विरासत
60 सेकंड में सांडर्स वध
1928 में भारत में साइमन कमीशन का विरोध हो रहा था। 30 अक्टूबर को लाहौर में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसमें लाला लाजपत राय घायल हुए और 17 नवंबर को उनका निधन हो गया।
HSRA के क्रांतिकारियों ने बदला लेने का फैसला किया। लक्ष्य था SP Scott — लेकिन 17 दिसंबर 1928 को गलत पहचान से ASP Saunders को गोली मारी गई। भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद इस कार्रवाई में शामिल थे।
दुर्गा भाभी की मदद से भगत सिंह भेष बदलकर लाहौर से निकले। बाद में असेंबली बम कांड हुआ, फिर लाहौर षड्यंत्र केस, और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई। सांडर्स वध भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की सबसे साहसी घटनाओं में से एक है।
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FAQ — सांडर्स वध
निष्कर्ष — सांडर्स वध: एक अमर प्रतिशोध
17 दिसंबर 1928 की वह शाम भारतीय इतिहास में अमर है। सांडर्स वध केवल एक पुलिस अधिकारी की हत्या नहीं था — यह उस ब्रिटिश साम्राज्य को एक सीधी चुनौती थी जिसने एक राष्ट्रनायक को सड़क पर पीटा था।
भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव थापर और दुर्गा भाभी — इन सभी ने मिलकर एक ऐसी घटना को अंजाम दिया जो आज नौ दशक बाद भी भारतीय युवाओं के दिलों में जीवित है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि अत्याचार का परिणाम होता है।
सांडर्स वध ने लाहौर षड्यंत्र केस और 23 मार्च 1931 की उस शहादत का मार्ग प्रशस्त किया जो भारतीय इतिहास की सबसे मार्मिक और प्रेरणादायी घटनाओं में से एक है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़े — क्योंकि वे जानते थे कि उन्होंने जो किया, वह सही था।
“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की एक-एक कील होगी।”
— लाला लाजपत राय, 30 अक्टूबर 1928 — लाठीचार्ज के दौरानलाला जी की भविष्यवाणी सच हुई। सांडर्स वध ने उस ताबूत में एक और कील ठोकी। और 1947 में वह ताबूत बंद हो गया — लेकिन तब तक भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, आज़ाद और अनगिनत अन्य शहीद अपना सब कुछ दे चुके थे।
स्रोत एवं संदर्भ
- National Archives of India — Lahore Conspiracy Case Records & HSRA Documents, New Delhi
- Punjab Digital Library — Contemporary Newspaper Records, October–December 1928; Lala Lajpat Rai Lathicharge Reports
- Manmathnath Gupta, They Lived Dangerously: Reminiscences of a Revolutionary (People’s Publishing House, 1969)
- Nehru Memorial Museum & Library — HRA-HSRA Documents; Saunders Murder Case Files
- Bipan Chandra, India’s Struggle for Independence (Penguin Books, 1989) — Chapter: Revolutionary Terrorism
- Encyclopaedia Britannica — “Bhagat Singh” entry; “Simon Commission” entry
- A.G. Noorani, The Trial of Bhagat Singh: Politics of Justice (Oxford University Press, 2001)
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अंतिम अपडेट: जून 2026 | स्रोत सत्यापन और संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित


