गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय | Guru Tegh Bahadur History In

गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय | Guru Tegh Bahadur History in Hindi

गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय , शहीदी दिवस ,जयंती ,की जीवनी ,इतिहास ,कहानी ,मृत्यु ( Guru Tegh Bahadur Biography In Hindi, history ,family , story ,Death )

गुरु तेग बहादुर सिखो के दसवे गुरुओं में से नौवे गुरु थे। जिन्होंने आनंदपुर साहिब एवं पटियाला की संस्थापना की थी। गुरु तेग बहादुर की मृत्यु मुग़ल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर उनका सर कलम कर देने से हुई थी ।

गुरु तेग बहादुर सिखो के दसवें एवं अंतिम गुरु गोविन्द सिंह जी के पिता थे। जिनकी मृत्यु के बाद मात्र नौ साल की उम्र में गुरु गोविन्द सिंह जी को उनकी गद्दी सौंपी गई थी।

आज हम उनकी जीवन की कहानियाँ एवं उनके द्वारा किया गए चमत्कार और उनकी जिंदगी से जुड़े हुए कुछ पहलुओं के बारे में जानेंगे।

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गुरु तेग बहादुर

गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय

Table of Contents

नाम (Name )गुरु तेग बहादुर
असली नाम (Real Name )त्याग मल
निक नेम (Nick Name )हिंद दी चादर 
प्रसिद्द (Famous for )सिख धर्म के  नौवें  गुरु
आनंदपुर साहिब के संस्थापक
पटियाला के संस्थापक
जन्म तारीख (Date of birth)1 अप्रैल 1621
जन्म स्थान (Place of born )अमृतसर , लाहौर सूबा , मुगल साम्राज्य
(वर्तमान पंजाब , भारत )
गृहनगर (Hometown )अमृतसर , पंजाब, भारत 
मृत्यु तिथि (Date of Death )24 नवंबर 1675
मृत्यु का स्थान (Place of Death)दिल्ली , मुगल साम्राज्य ,भारत
मृत्यु का कारण (Reason of Death) सम्राट औरंगजेब के आदेश पर सिर कलम
उम्र( Age)54 साल (मृत्यु के समय )
कार्यकाल (Guruship)साल 1665- साल 1675 तक
धर्म (Religion)सिख
नागरिकता(Nationality)भारतीय
वैवाहिक स्थिति (Marital Status)  शादीशुदा
विवाह की तारीख (Date Of Marriage )4 फरवरी 1632

गुरु तेग बहादुर का जन्म  (Guru Tegh Bahadur Birth)

गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर , लाहौर सूबा , मुगल साम्राज्य (वर्तमान पंजाब , भारत ) में त्याग मल के रूप में हुआ था। उनका जन्म छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद और उनकी पत्नी माता नानकी के यहां हुआ था। 

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गुरु तेग बहादुर का जन्म 

एक बच्चे के रूप में, त्याग मल ने अपने भाई गुरदास से संस्कृत, हिंदी और गुरुमुखी सीखी। जहां उन्हें घुड़सवारी और तीरंदाजी की शिक्षा बाबा बुद्ध जी ने दी थी, वहीं उनके पिता गुरु हरगोबिंद ने उन्हें तलवारबाजी की शिक्षा दी थी।

तेग बहादुर एक ऐसे दौर में पले-बढ़े जब उनके पिता, गुरु हरगोबिंद, मुगलों के खिलाफ कुछ रक्षात्मक लड़ाई लड़नी पड़ी।

जब गुरु तेग बहादुर सिर्फ 13 साल के थे तब 14 अप्रैल 1634 को अमृतसर में किसी बहाने लाहौर के बादशाह शाहजहाँ के सेनापति मुखलिस द्वारा हमला किया गया ।

गुरुहरगोविंद और सिखों ने अपनी जमीन और शहर की रक्षा की। इस लड़ाई में मुखलिस खान मारा गया और हमलावर बल को खदेड़ दिया गया।गुरु हरगोबिंद और त्याग मल के लिए द्वारा करतारपुर को सफलतापूर्वक बचा लिया गया था।

युद्ध में महान वीरता और सैन्य कौशल का प्रदर्शन करने के लिए, गुरु हरगोबिंद ने अपने बेटे को ‘तेग बहादुर’ की उपाधि दी, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘बहादुर तलवार चलाने वाला’। त्याग मल को आगे से तेग बहादुर के नाम से जाना जाने लगा।

गुरु तेग बहादुर का परिवार (Guru Tegh Bahadur Family )

पिता का नाम (Father)गुरु हरगोबिंद सिंह
माँ का नाम (Mother )माता नानकी
भाई का नाम (Brother )बाबा गुरदित्त, सूरज मल, अनी राय एवं अटल राय 
बहन का नाम (Sister )बहन बीबी वीरो
पत्नी का नाम (Wife )माता गुजरी चंद सुभीखी
बच्चो के नाम (Children ) गुरु गोबिंद सिंह

गुरु तेग बहादुर की शादी  ( Guru Tegh Bahadur Marriage)

गुरु तेग बहादुर की शादी 

जैसा की उस समय कम उम्र में ही शादी कर देनी की परंपरा थी ठीक वैसे ही हुआ और मात्र 12 साल की उम्र में 4 फरवरी 1632 को गुरु तेग बहादुर का विवाह माता गुजरी चंद सुभीखी से कर दिया गया था ।

अब तक, तेग बहादुर ने अपना अधिकांश समय ध्यान में बिताना शुरू कर दिया था और धीरे-धीरे खुद को एकांत में ले लिया था। 

1644 में, गुरु हरगोबिंद ने तेग बहादुर को अपनी पत्नी और अपनी मां के साथ बकाला गांव में जाने के लिए कहा। अगले दो दशकों में तेग बहादुर ने अपना अधिकांश समय बकाला में एक भूमिगत कमरे में ध्यान लगाने में बिताया, जहाँ बाद में उन्हें नौवें सिख गुरु के रूप में पहचाना जाएगा। 

बकाला में अपने प्रवास के दौरान, तेग बहादुर ने बड़े पैमाने पर यात्रा की और आठवें सिख गुरु, गुरु हर कृष्ण से मिलने के लिए दिल्ली भी गए।

500 सोने के सिक्को की कहानी एवं गुरु की खोज ( Guru Tegh Bahadur Guruship)

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गुरु की खोज

साल 1664 में जब गुरु हर कृष्ण का स्वास्थ्य चेचक से बुरी तरह प्रभावित हुआ, जिसके कारण 30 मार्च, 1664 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु शय्या पर रहते हुए, गुरु हर कृष्ण से पूछा गया कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, जिसके लिए उन्होंने बस ‘ बाबा ‘ शब्द कहा ‘ और ‘बकला’, जिसका अर्थ था कि अगला गुरु बकाला में मिलेगा।

 जब अगले सिख गुरु के बारे में बात फैली, तो कई धोखेबाज बकाला में बस गए और मौद्रिक और अन्य तुच्छ लाभ के लिए अगले गुरु होने का दावा किया। इससे सिखों में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई क्योंकि इसने वास्तविक सिख गुरु को खोजने का कार्य बहुत कठिन बना दिया।

इस बीच, बाबा माखन शाह लबाना नाम का एक धनी व्यापारी एक बार एक शक्तिशाली तूफान में फंस गया था, जिसने उसका जहाज लगभग पलट दिया था। 

घटना के दौरान, बाबा माखन शाह ने खुद को असहाय महसूस किया और इसलिए भगवान से प्रार्थना की कि अगर उनका जहाज बच जाता है तो वे अपने गुरु को 500 सोने के सिक्के चढ़ाएंगे। तब तक माखन शाह को नहीं मालूम नहीं था की उनके गुरु हर कृष्ण की मृत्यु हो गई है।

चमत्कारिक रूप से उनका जहाज बच जाता है जिसके बाद, बाबा माखन शाह अपने गुरु हर कृष्ण से मिलने जाते है , लेकिन उन्हें गुरु के निधन की सूचना मिलती है । उन्हें यह भी बताया गया कि गुरु हर किशन ने दावा किया था कि अगला गुरु खोजा जा रहा है जो बकाला में मिलेगा।

अगस्त 1664 को जब बाबा माखन शाह लबाना बकाला पहुंचे, तो उन्हें नौवें सिख गुरु होने का दावा करने वाले 22 धोखेबाजों को देखकर आश्चर्य हुआ। 

बाबा माखन शाह ने अपनी प्रार्थना को याद किया जिसमे उन्होंने अपने गुरु को 500 सोने के सिक्के देने का वायदा किया था और फिर हर धोखेबाज को 500 सोने के सिक्के देने की जगह वह जानभूझकर सोने के 2 सिक्के देने लगते है । जैसी कि उम्मीद थी, दो दीनार पाकर सभी धोखेबाज खुशी-खुशी चले गए। 

बाबा माखन शाह, जो वास्तविक गुरु से न मिलने से निराश थे। 10 अगस्त, 1664 को बाबा माखन शाह को मालूम चलता है की एक गुरु तेग बहादुर अभी भी बचे है जो बकाला में मौजूद है तो वह गुरु तेग बहादुर से मिलने जाते है।

तेग बहादुर को देखकर, बाबा माखन शाह भी दूसरे गुरुओं की तरह उनके सामने भी दो सोने के सिक्के रख देते है। बाबा माखन शाह द्वारा रखे गए सोने के दो सिक्को को देख कर गुरु तेग बहादुर जी कहते है , ‘क्यों दो सोने के सिक्के जब आपने तो उस दिन भगवान् से 500 सोने के सिक्के देने का वचन दिया था।

उन शब्दों को सुनकर, बाबा माखन शाह एक दम से दंग रह जाते है क्योकि उन्होंने वो वचन सिर्फ अकेले में भगवान् को दिया था जब उनके आस पास कोई दूसरा व्यक्ति मौजूद नहीं था।

गुरु तेग बहादुर अपनी बात रखने के बाद अपने कंधे से कपडे को निचे करके अपने घाव दिखाते है और कहते है उस दिन मैने तुम्हारे जहाज को धक्का दिया था ताकि वो समुंदर में ना डूब जाये।

तब बाबा माखन शाह अपने दिए वचन के मुताबिक गुरु तेग बहादुर के सामने 500 सोने के सिक्के रखते है और उत्साह के साथ चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘गुरु लाधो रे’ (मुझे गुरु मिल गया है)। इसके बाद, तेग बहादुर को नौवें सिख गुरु के रूप में घोषित किया गया।

गुरु गोविन्द सिंह का जन्म (Birth of Guru Gobind Singh )

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गुरु गोविन्द सिंह का जन्म

साल 1666 के दौरान जब गुरु तेग बहादुर पटना, बिहार में अपनी पत्नी, परिवार के सदस्यों और सिख संगत को छोड़कर बिहार, असम और वर्तमान बांग्लादेश के क्षेत्रों में पटना के पूर्व की यात्रा कर रहे थे।

इस समय माता गुजरी एक बच्चे की उम्मीद कर रही थीं, इसलिए उन्हें यात्रा करने में मुश्किल हो रही थी। गुरु तेग बहादुर से उसके विवाह को 34 साल बीत चुके थे।

दिन के पहली सुबह से तीन घंटे पहले, अपने 42वे वर्ष की सर्दियों में, शुक्रवार, 5 जनवरी, 1666 को, माता गुजरी जी एक राजकुमार की माँ बनीं। एक इतने छोटे बच्चे के राजसी असर से चकित होकर, माता नानकी ने अपने नवजात पोते को गर्व से उसकी माँ की फैली हुई भुजाओं तक पहुँचाया।

कमरे के बाहर अपनी चौकी पर, कृपाल चंद ने शिशु को अपनी पहली सांस लेते हुए सुना और तुरंत, वह गुरु को खोजने और अपने बेटे के जन्म की खबर देने के लिए सिग्नल की प्रतीक्षा में खड़े कूरियर को भेजने के लिए मुड़ा। इस प्रकार गोबिंद राय का जन्म पूर्वी भारत के बिहार के पटना शहर में हुआ था।

गुरु तेग बहादुर के कार्य  ( Guru Tegh Bahadur Work )

सिख गुरु ने ग्रंथ साहिब को कई भजन लिखे। उनकी अन्य रचनाओं में 116 शबद, 15 राग और 782 रचनाएँ शामिल हैं, जिन्हें पवित्र सिख पुस्तक – ग्रंथ साहिब में भी जोड़ा गया था। 

उन्होंने ईश्वर, मानवीय संबंधों, मानवीय स्थिति, शरीर और मन, भावनाओं, सेवा, मृत्यु और गरिमा जैसे विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला के बारे में लिखा।

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गुरु तेग बहादुर के कार्य

पहले सिख गुरु, गुरु नानक की शिक्षाओं का प्रचार करने के लिए गुरु तेग बहादुर ने देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा शुरू की। उन्होंने जरूरतमंदों की मदद करते हुए सिख धर्म का संदेश भी फैलाना शुरू किया। 

1664 में, गुरु तेग बहादुर ने तीन अलग-अलग कारणों से तीन बार किरतापुर का दौरा किया। 21 अगस्त, 1664 को अपनी पहली यात्रा के दौरान, गुरु सातवें सिख गुरु की बेटी बीबी रूप से मिले, जो अपने पिता के साथ-साथ अपने भाई की मृत्यु का शोक मना रही थी।

 दूसरी यात्रा सातवें सिख गुरु, गुरु हर राय की मां बस्सी की मृत्यु से प्रेरित थी। तीसरी यात्रा ने उत्तर पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप के माध्यम से एक लंबी यात्रा के अंत को चिह्नित किया।

बिलासपुर की अपनी एक यात्रा पर, गुरु तेग बहादुर बिलासपुर की रानी चंपा से मिले, जिन्होंने उन्हें जमीन का एक टुकड़ा दिया। गुरु ने उस भूमि के लिए 500 रुपये का भुगतान करने पर जोर दिया, जहां उन्होंने आनंदपुर साहिब नामक एक शहर की स्थापना की।

गुरु तेग बहादुर के कुछ कार्यों को ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में जोड़ा गया है और इसमें कई विषयों को शामिल किया गया है, जिसमें भगवान, मन, शरीर, शारीरिक लगाव आदि की प्रकृति शामिल है। 1672 में, गुरु ने उत्तर-पश्चिम सीमांत के माध्यम से यात्रा की, जहां गैर-मुसलमानों का उत्पीड़न चरम पर था।

चरवाहे की कहानी एवं गुरु तेग बहादुर की गिरप्तारी

जब तत्कालीन मुगल सम्राट औरंगजेब ने कश्मीर के ब्राह्मण विद्वानों को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया, तो ब्राह्मणों ने समाधान के लिए गुरु तेग बहादुर से संपर्क किया।

 गुरु ने उन्हें औरंगजेब को एक संदेश के साथ वापस भेजा, जिसमें कहा गया था कि मुगल सम्राट ब्राह्मणों को तभी परिवर्तित कर सकता है यदि अगर वह गुरु तेग बहादुर सिख से इस्लाम में परिवर्तित करने में सफल होता है।

मुग़ल सम्राट औरंगजेब आदेश

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मुगल सम्राट औरंगजेब

उनकी यह बात सुनकर मुग़ल सम्राट गुस्से से पागल हो गया था और उसने गुरु तेग बहादुर की गिरप्तारी की आदेश जारी कर दिए थे।

जैसे ही गुरु तेग बहादुर को अपनी गिरप्तारी के आदेश मिले वे अपने अनुयायिओं और अपने भाइयो और पत्नी को साथ लेकर श्री आनंदपुर साहिब से यात्रा शुरू कर दी।

सैफाबाद (पटियाला) में रुककर गुरु साहिब यहां आगरा पहुंचे। इस स्थान पर गुरु साहिब आगरा शहर के बाहर रुके।

चरवाहे की भूमिका

जैसा कि इतिहास से पता चलता है कि हसन अली के नाम से एक चरवाहा था जो यहां बकरियों को चराने के लिए लाया करता था।

वह हमेशा भगवान से प्रार्थना करता था कि हिंदुओं का उद्धार करने वाले व्यक्ति एक दिन गिरफ्तार हो जाए और वह उस हिंदुओं का उद्धार करने वाले व्यक्ति (गुरु तेग बहादुर साहिब की) गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार हो और इस प्रक्रिया में 500 रुपये का इनाम भी मिले और इतिहास में कुछ भी ऐसा ही।

गुरु तेग बहादुर को वह चरवाहा जिसका नाम हसन अली था वह दिखता है। गुरु तेग बहादुर हसन अली को बाजार से उसके लिए कुछ मिठाई लाने के लिए क्योंकि वह ( हसन अली )भूखा था।

गुरु साहिब ने मिठाई और भोजन लाने के लिए अपनी कीमती अंगूठी दी। जिसे बेचकर उन पैसो से वह अपने लिए कुछ मिठाई खरीद कर खा सके और अपनी भूख मिटा सके।

हसन अली हलवाई के पास जाता है और मिठाई के बदले में दुकानदार को अंगूठी दे देता है । इतनी महंगी चीजें देखकर दुकानदार को शक होता है कि एक चरवाहे के पास ऐसी महंगी चीजें कैसे हो सकती हैं, हो सकता है कि उसने चोरी की हो और इसकी सूचना कोतवाली (पुलिस स्टेशन) को दे देता है ।

पुलिस ने हसन अली को गिरफ्तार कर लिया जो उन्हें गुरु साहिब के पास ले गया। फिर पुलिस गुरु तेग बहादुर से पूछती है तुम कौन हो और बदले में जवाब आता है “हिंदुओं का उद्धारकर्ता तेग बहादुर मेरा नाम है”। यह सुनकर पुलिस अन्य सिखों के साथ गुरु साहिब को गिरफ्तार कर लेती है ।

गुरु तेग बहादुर की मृत्यु (Guru Teg Bahadur Death )

भोरा साहिब (मुख्य दरबार साहिब के नीचे) में गुरु साहिब को 9 दिनों तक आंखों पर पट्टी बांधकर रखा गया था। हसन अली को बदले में 500 रुपये का इनाम दिया जाता है । यहां से गुरु साहिब और अन्य सिखों को कड़ी सुरक्षा के बीच दिल्ली ले जाया गया

गुरु तेग बहादुर को उनके कुछ अनुयायियों, भाई मति दास और भाई दयाल दास के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था।  । फिर उन्हें लोहे के पिंजरे में डाल दिया गया और दिल्ली ले जाया गया, जहां वे 4 नवंबर 1675 को पहुंचे।

जैसा की सम्राट औरंगजेब ने आदेश दिया था की सभी को इस्लाम धर्म में परवर्तित होना है। यह बात गुरु बहादुर एवं उनके भाई इस बात को मानने से इंकार कर देते है तो उन तीनो प्रताड़ित किया जाता है।

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गुरु तेग बहादुर की मृत्यु

प्रताड़ित करने के बाद उन उन तीनो से एक बार फिर पूछा जाता है लेकिन बावजूद इस्लाम अपनाने से इनकार कर दिया जाता , तो औरंगजेब ने उन्हें फांसी देने का आदेश दिया। 

जब माटी दास को मौत के घाट उतार दिया गया, तो दयाल दास को उबलते पानी की एक बड़ी कड़ाही में डाल दिया गया।

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माटी दास

24 नवंबर, 1675 को मुगल शासक के खिलाफ खड़े होने के लिए दिल्ली में गुरु तेग बहादुर का सिर कलम कर दिया गया था।

गुरु तेग बहादुर की मृत्यु के बाद ( After Death of Guru Tegh Bahadur )

गुरु तेग बहादुर की फांसी के बाद, सिख पहले से कहीं अधिक लचीला हो गए। कई सिख मंदिर गुरु तेग बहादुर और उनके मृत अनुयायियों की याद में बनाए गए थे।

 चांदनी चौक में ‘गुरुद्वारा सीस गंज साहिब’ बनाया गया था, जहां गुरु को फाँसी दी गई थी। उनके फाँसी के बाद, गुरु के कटे हुए सिर को उनके एक अनुयायी भाई जैता द्वारा पंजाब वापस ले जाया गया था।

 उनके सिर का अंतिम संस्कार करने के बाद वहां एक और सिख मंदिर बनाया गया। गुरु का बलिदान सिख धर्म के अनुयायियों को अपने विश्वास के प्रति सच्चे रहने की याद दिलाता रहता है।

गुरु तेग बहादुर की विरासत ( Guru Tegh Legacy )

गुरु तेग बहादुर के वध के बाद, उनके पुत्र गोबिंद सिंह दसवें सिख गुरु बने और उन्हें गुरु गोबिंद सिंह के नाम से जाना जाने लगा। 

गुरु तेग बहादुर की फांसी ने गुरु गोबिंद सिंह पर एक अमिट छाप छोड़ी, जो उस समय सिर्फ नौ साल के थे। नतीजतन, गुरु गोबिंद सिंह ने सिख समूह को इस तरह से संगठित किया कि यह अंततः एक विशिष्ट और प्रतीक-पैटर्न वाला समुदाय बन गया। साथ ही, सिखों ने बहादुरी और आत्मरक्षा जैसे पहलुओं पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया, जिसने ‘खालसा’ को जन्म दिया।

शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों सहित कई जगहों के नाम गुरु तेग बहादुर के नाम पर रखे गए हैं। इनमें से कई स्थान जहां पंजाब में स्थित हैं,

वहीं भारत के अन्य हिस्सों में भी कई स्थान हैं, जिनका नाम गुरु तेग बहादुर के नाम पर रखा गया है।जबकि महाराष्ट्र में उनके नाम पर कई शैक्षणिक संस्थान हैं, नई दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे स्थानों में भी कई स्कूल और कॉलेज हैं जिनका नाम महान सिख गुरु के नाम पर रखा गया है।

गुरु तेग बहादुर के श्लोक (Guru Tegh Bahadur Quotes )

  • महान कार्य छोटे-छोटे कार्यों से बने होते हैं।
  • किसी के द्वारा प्रगाढ़ता से प्रेम किया जाना आपको शक्ति देता है और किसी से प्रगाढ़ता से प्रेम करना आपको साहस देता है।
  • सफलता कभी अंतिम नहीं होती, विफलता कभी घातक नहीं होती, इनमें जो मायने रखता है वो है साहस।
  • सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान अहिंसा है।
  • दिलेरी डर की गैरमौजूदगी नहीं, बल्कि यह फैसला है कि डर से भी जरूरी कुछ है।
  • जीवन किसी के साहस के अनुपात में सिमटता या विस्तृत होता है।
  • प्यार पर एक और बार और हमेशा एक और बार यकीन करने का साहस रखिए।
  • अपने सिर को छोड़ दो, लेकिन उन लोगों को त्यागें जिन्हें आपने संरक्षित करने के लिए किया है। अपना जीवन दो, लेकिन अपना विश्वास छोड़ दो।
  • एक सज्जन व्यक्ति वह है जो अनजाने में किसी की भावनाओ को ठेस ना पहुंचाएं।
  • गलतियां हमेशा क्षमा की जा सकती हैं, यदि आपके पास उन्हें स्वीकारने का साहस हो।
  • हार और जीत यह आपकी सोच पर ही निर्भर है, मान लो तो हार है ठान लो तो जीत है।
  • आध्यात्मिक मार्ग पर दो सबसे कठिन परिक्षण हैं, सही समय की प्रतीक्षा करने का धैर्य और जो सामने आए उससे निराश ना होने का साहस।
  • डर कहीं और नहीं, बस आपके दिमाग में होता है
  • इस भौतिक संसार की वास्तविक प्रकृति का सही अहसास, इसके विनाशकारी, क्षणिक और भ्रमपूर्ण पहलुओं को पीड़ित व्यक्ति पर सबसे अच्छा लगता है।
  • हर एक जीवित प्राणी के प्रति दया रखो, घृणा से विनाश होता है।
  • साहस ऐसी जगह पाया जाता है जहां उसकी संभावना कम हो।नानक कहते हैं, जो अपने अहंकार को जीतता है और सभी चीजों के एकमात्र द्वार के रूप में भगवान को देखता है, उस व्यक्ति ने ‘जीवन मुक्ति’ को प्राप्त किया है, इसे असली सत्य के रूप में जानते हैं।

FAQ

गुरु तेग बहादुर सिख धर्म के कौन से गुरु थे ?

गुरु तेग बहादुर सिख धर्म के नौवे गुरु थे।

गुरु तेग बहादुर जी का असली नाम क्या था ?

गुरु तेग बहादुर जी का असली नाम त्याग मल था।

गुरु तेग बहादुर की मृत्यु कब हुई थी ?

गुरु तेग बहादुर की मृत्यु 24 नवंबर 1675 को हुई थी।

गुरु तेग बहादुर की पत्नी का क्या नाम था ?

गुरु तेग बहादुर की पत्नी का नाम माता गुजरी चंद सुभीखी था।

गुरु तेग बहादुर की हत्या कैसे हुई ?

गुरु तेग बहादुर की हत्या मुग़ल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर उनका सर कलम कर देने से हुई थी ।

गुरु तेग बहादुर शहादत दिवस कब है 2021 ?

गुरु तेग बहादुर शहादत दिवस 24 नवंबर 2021 को है।

गुरु तेग बहादुर के पिता का नाम क्या था ?

गुरु तेग बहादुर के पिता का नाम गुरु हरगोविंद था।

गुरु तेग बहादुर के तीन सहयोगी बलिदानी कौन थे ?

गुरु तेग बहादुर के तीन सहयोगी बलिदानी  भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला थे।

गुरु तेग बहादुर ने कौन सा शहर बसाया था ?

गुरु तेग बहादुर ने आनंदपुर साहिब  शहर बसाया था।

गुरु तेग बहादुर का जन्म कब हुआ कहां हुआ ?

गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर , लाहौर सूबा , मुगल साम्राज्य (वर्तमान पंजाब , भारत ) में त्याग मल के रूप में हुआ था। 

गुरु तेग बहादुर जी की याद में उनके शहीदी स्थल पर कौन सा गुरुद्वारा बना है ?

गुरु तेग बहादुर की दिल्ली के चाँदनी चौक पर सर काटकर हत्या कर दी गई थी। उनके शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा बनाया गया जिसे गुरुद्वारा शीशगंज साहब नाम से जाना जाता है। 

गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने हिन्दू धर्म के लिए अपना बलिदान कब किया ?

गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने हिन्दू धर्म के लिए अपना बलिदान 24 नवंबर 1675 को दिया।

गुरु तेग बहादुर जी के कितने पुत्र थे ?

गुरु तेग बहादुर जी का एक पुत्र था जिसका नाम गुरु गोविन्द सिंह था जो बाद में सीखो दसवें गुरु बने थे।

गुरु तेग बहादुर को हिंद की चादर क्यों कहा जाता है ?

उन्होंने आस्था, विश्वास और अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया इसलिए उन्हें सम्मान के साथ हिंद दी चादर कहा जाता है।

गुरु तेग बहादुर सिंह के बचपन का नाम क्या है ?

गुरु तेग बहादुर सिंह के बचपन का नाम त्याग मल था।

गुरु तेग बहादुर जी के समय कश्मीर का गवर्नर कौन था ?

गुरु तेग बहादुर जी के समय कश्मीर का गवर्नर  इफ्तार खां थे।

श्री गुरु तेग बहादुर का मूल नाम क्या था ?

गुरु तेग बहादुर सिंह का मूल नाम त्याग मल था।

यह भी जानें :-

अंतिम कुछ शब्द –

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