ऑपरेशन ब्लू स्टार 1984 ,इंदिरा गाँधी की मौत की वजह ।Operation Blue Star

ऑपरेशन ब्लू स्टार 1984 ,इंदिरा गाँधी की मौत की वजह ।Operation Blue Star

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3 जून से 6 जून 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार ,भारतीय सेना द्वारा पंजाब के अमृतसर में स्थित सिखो का सबसे पवित्र स्थान ”स्वर्ण मंदिर” को खालिस्थान के समर्थक” जनरैल सिंह भिंडरावाले” एवं उनके समर्थको द्वारा मुक्त कराने के लिए चलाया गया अभियान का कोड नेम था. इस अभियान को ही ऑपरेशन ब्लू स्टार इसीलिए कहा जाता है क्योकि सेना के द्वारा ज्यादातर कारवाही रात के अँधेरे में चन्द्रमा की रौशनी के नीचे की गयी थी।

ऑपरेशन ब्लू स्टार
भारत सरकार द्वारा अकालतख्त की मरम्मत

कुछ महीनो के बाद इसी ऑपरेशन ब्लू स्टार की वजह से भारत की उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था और इसके बाद 1984 में कुछ महीनो के बाद सिख दंगे हुए थे जिसमे हजारो सिखो को खुलेआम सड़को पर मार दिया गया था

ऑपरेशन ब्लू स्टार की पूरी कहानी को शुरू करने से पहले ये जानना बहुत जरुरी है की खालिस्थान के समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले कौन थे और क्यों उनकी वजह से इस ऑपरेशन ब्लू स्टार को शुरू करने की जरुरत पड़ी तो आईये जानते है इस ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में।

जनरैल सिंह भिंडरावाले कौन थे ?

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37 साल के जनरैल सिंह भिंडरावाले का पूरा नाम जरनैल सिंह बराड़ था. ये सिखो के धार्मिक संस्थान दमदमी टकसाल (धार्मिक स्कूल ) के नेता थे।

ऑपरेशन ब्लू स्टार
जनरैल सिंह भिंडरावाले

साल 1982 में इन्होने सिखो के दूसरे दल जिसे अकाली दल के नाम से भी जाना था है, के साथ मिलकर एक धार्मिक अभियान शुरू किया था और इस अभियान का मुख्य उद्देश्य पंजाब को भारत से अलग करके स्वतंत्र देश बनानां था।

जनरैल सिंह भिंडरावाले द्वारा चलाये गए धार्मिक अभियान की वजह से कई लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था और बाद में इस आंदोलन को ज्यादा ऊंचा उठता देख उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू करने जरुरत महसूस हुयी जिसमे सेना द्वारा किया गया ये ऑपरेशन ,जनरैल सिंह भिंडरावाले की मौत के साथ ख़त्म हुआ।

क्यों जरुरत पड़ी ऑपरेशन ब्लू स्टार की ?

पंजाब के अकाली दल की मांगे

इस समस्या शुरुआत साल 1970 में ही शुरू हो गयी थी जब अकाली दल ने पंजाब से सबंधित कुछ बातों की मांग शुरू कर दी थी और अकाली दल की मांगे सरकार के लिए सरदर्द बनती जा रही थी। साल 1973 और 1978 में अकाली दल अपनी मांगो को लेकर मुहिंम छेड़ता आ रहा था और आनंदपुर साहिब प्रस्ताव जारी किया

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अकाली दल द्वारा पंजाब के भलाई के लिए जारी किये आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की गयी मांगे कुछ इस तरह थी –

  • चंड़ीगर, जो पंजाब एवं हरियाणा की राजधानी है इसको सिर्फ और सिर्फ पंजाब की राजधानी बनाया जाये।
  • पंजाब केंद्र सरकार का सिर्फ रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा जैसे कार्यो पर अधिकार हो और बाकि मामलो पर पंजाब को खुद निर्णय लेने का अधिकार हो जिसमे केंद्र सरकार की कोई दखलबाजी शामिल ना हो।
  • बिजली बनाने का स्रोत एवं अधिकार सिर्फ पंजाब के पास हो।
  • भारतीय फ़ौज में लोगो की भर्तियां लोगो के कबिलियत के आधार पर हो और सिखो की भर्तियों के लिए लगाए गए कानून स्तगित हो।
  • गुरुद्वारो के लिए अखिल भारतीय गुरुद्वारा कानून बनाया जाये

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कांग्रेस का कमजोर पड़ना –

वक़्त के साथ साथ अकाली दल कांग्रेस के लिए सरदर्दी बनता जा रहा था क्योकि अकाली दल की लोकप्रियता उस समय कांग्रेस से ज्यादा हो चुकी थी और कभी भी कांग्रेस की जगह अकाली दल ले सकता था क्योकि भारत में लोगो के पास कांग्रेस के अलावा अब एक और विकल्प था और वो था अकाली दल।

इंदिरा गाँधी ये बात अच्छी तरह समज चुकी थी और उन्होंने अकाली दल को तोड़ने के लिए उन्होंने सरदार ज्ञानी जैल सिंह को पंजाब के मुख्य्मंत्री के पद पर तैनात कर दिया। अकाली दल को खत्म करने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को लाया गया

जनरैल सिंह भिंडरावाले की लोकप्रियता का बढ़ना

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ऑपरेशन ब्लू स्टार 1984 ,इंदिरा गाँधी की मौत की वजह ।Operation Blue Star 16

पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह एवं दरबारा सिंह के साथ साथ संजय गाँधी का हाथ जनरैल सिंह भिंडरावाले के ऊपर रखा हुआ था। कुछ समय के बाद भिंडरावाले को पंजाब का मुखिया बनाया गया जिससे उसको लोकप्रियता हासिल होने लगी

साल 1977 में भिंडरावाले को दमदमी टकसाल का अध्यक्ष चुना गया और मात्र एक साल के बाद 13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में अकाली दल और निरंकारियों के बीच लड़ाई छिड़ गयी जिसमे 13 अकाली दल के लोग मारे गए। इस घटना के 2 साल के बाद अकाली दल वालो ने निरंकारियों के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी। बाबा गुरबचन सिंह की मौत की असली वजह जनरैल सिंह भिंडरावाले था उसके दल के सदस्य उसके लिए जान दे भी रहे थे और जान ले भी रहे थे।

पंजाब में दंगे और लड़ाईयों की शुरुआत

साल 1980 में हुए चुनावों में इंदिरा गाँधी को बहुत बड़ी जीत हासिल हुए जिसके बाद इंदिरा गाँधी ने पंजाब मुख्यमंत्री का पद संभाल रहे ज्ञानी जैल सिंह को गृहमंत्री नियुक्त किया और दरबारा सिंह को पंजाब का मुख्य्मंत्री बना दिया गया। अकाली दल अपनी मांगो को लेकर जोर दे रहा था लेकिन भिंडरावाले ने केंद्र सरकार को अपनी मांगे ना पूरी करने के लिए निशाना बनाया। पंजाब के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह और अकाली दल के बीच झड़पे चलने लगी

भिंडरावाले लोगो को लगातार भड़काऊ भाषण दिए जा रहा था जिस भिंडरावाले को सरकार ने आदमी समझा था अब वो सरकार को काटने को दौड़ रहा था अब यहां कांग्रेस के लिए पाशा उल्टा पड़ गया क्योकि पहले तो सरकार को सिर्फ अकाली दल से निपटना था

अब भिंडरावाले अपने विवादपूर्ण भाषणों से लोगो को अपने साथ मिलाये जा रहा था और लगातार हो रही भिंडरावाले और सरकार के बीच तनबन अब लड़ाईयों का रूप ले चुकी थी पंजाब में दंगे होने लगे। पंजाब केशरी अख़बार ने जनगणना के दौर के समय सिखो से उनकी भाषा पूछी जानी लगी जिससे सिख ओर ख़फ़ा हो गए और पंजाब केशरी अख़बार ने हिंदी भाषा को लेकर मुहीम चला दी जिससे गुस्साए सिखो ने 9 सितंबर 1981 को पंजाब केशरी अख़बार समूह के संपादक लाला जगत नारायण को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया।

भिंडरावाले पर पंजाब केशरी अख़बार समूह के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या का आरोप लगा जिसके कुछ दिनों बाद 15 सितम्बर को भिंडरावाले गिरप्तार कर लिया गया लेकिन सबूत ना मिलने के कारण छोड़ना पड़ा।

पंजाब को अलग करने की मांग एवं पंजाब के डीआईजी की हत्या

भिंडरावाले के छूटते ही एक बार फिर से भारत से अलग करके पंजाब को अलग देश बनाने की मुहीम शुरू हो गयी और इस बात को लेकर दंगे ,लड़ाईया शुरू हो गयी। पंजाब में हो रही हिंसा का फायदा उठा कर भिंडरावाले के लोगो ने पंजाब के डीआईजी एएस अटवाल कर दी गयी और लाश को स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर फेक दिया गया जिसको बाद में हटवाने के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह को भिंडरावाले के आगे हाथ पैर जोड़ने पड़े।

हिन्दू यात्रियों का कत्लेआम

भिंडरावाले की अगुवाई में पंजाब के हालत एक टाइम बॉम्ब जैसे हो गए थे जो अब किसी भी समय फट सकता था उधर पंजाब को अलग करने की मांग और आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को अनुमति लेने के लिए पंजाब का दंगो का शहर बन चुका था।

कपूरथला से जालंधर जा रही लोगो से भरी हुए बस में से हिन्दुओं को बस से बाहर निकल कर बड़ी बेहरमी से मारा गया और हिन्दुओं को पंजाब से बाहर निकालने की मुहीम छिड़ गयी। हालत काबू से बाहर होते देख इंदिरा गाँधी ने दरबारा को मुख़्यमंत्री के पद से हटाकर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया लेकिन इससे सरकार को ज्यादा फायदा नहीं हुआ।

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15 दिसंबर, 1983 को भिंडरावाले का अकालतख्त पर कब्ज़ा –

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अकालतख्त

जनरैल सिंह भिंडरावाले ने अपने हथियार बंद सहयोगियों के साथ स्वर्णमंदिर के अकाल तख्त को अपने कब्ज़े में ले लिया और ये हिन्दुओ को पंजाब से बाहर निकालना चाहते थे.

भिंडरावाले और उनके साथियो के पास गोला बारूद एवं बंदूकों की एक बड़ी मात्रा मौजूद थी ऐसा माना जाता है की स्वर्णमंदिर में लंगर के सामान लाने और ले जाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले ट्रको में ये सारा विस्फोटक सामान मंदिर के अंदर लाया गया था जिससे किसी को भी शक नहीं हुआ और भिंडरावाले और उनके साथियो ने स्वर्णमंदिर के अंदर लड़ाई से बचने और हमला करने के लिए सारे इंतजाम पहले से ही किये हुए थे।

बात को हाथ से निकलता देखकर प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने पंजाब को दंगामुक्त एवं साफ सुथरा शहर बनाने के लिए 1 जून, 1984 को भारतीय सेना के हवाले कर दिया

ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरुआत

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ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरुआत 1 जून 1984 से हो गयी थी जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आदेश पर भारतीय फ़ौज अपने सैनिको को लेकर अमृतसर और पंजाब के अन्य शहरो में पहुंच गयी थी।

सिखो के पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर पर खालिस्थान के समर्थको के नेता जनरैल सिंह भिंडरावाले एवं उनके समर्थको ने भारी बंदूकों एवं गोला बारूदों के साथ कब्ज़ा कर लिया था।

भारतीय सेना ने सबसे पहले स्वर्ण मंदिर आस पास की इमारतों पर कब्ज़ा किया और इन इमारतों में सीआरपीएफ और बीएसएफ के द्वारा जनरैल सिंह भिंडरावाले एवं उनके समर्थको पर नजर रखी जा रही थी।

1 जून 1984 को पूरे पंजाब में कर्फ्यू लागू कर दिया गया और कुछ घंटो के भीतर ही भारतीय सेना के 70000 सैनिक ओर बुला लिए गए जिनको पूरे पंजाब में फैला दिया गया।

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इंदिरा गाँधी दूरदर्शन पर

2 जून 1984 भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने दूरदर्शन पर आकर लोगो को कहा की वो पंजाब में हो रहे आतंकवाद को पूरी तरह से ख़तम कर देगी और इसके साथ साथ उन्होंने अकाली दलों और उनके नेताओ से इस आतंकवाद के ख़तम होने के बाद किसी भी तरह के आंदोलन को ना करने के लिए भी चेताया।

मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार द्वारा की भारतीय सेना की अगुवाई-

ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए भारतीय सेना की फ़ौज का नेतत्व का जिम्मा मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार को सौपा गया।

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3 जून 1984 में इस ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए सबसे पहले मीडिया को पंजाब से बाहर का रास्ता दिखाया गया और इसके बाद सैलानियों को भी पंजाब में घुसने से रोक दिया गया पंजाब से सटे हुए सारे राजस्थान ,पाकिस्तान और कश्मीर बॉर्डर सील कर दिए गए।

3 जून 1984 ( सेना द्वारा सरेंडर करने के लिए चेतवानी देना )

सिखो के लिए बहुत पावन दिन होता है और लोग स्वर्ण मंदिर में माथा टेकने जाते है और लोग इतना कुछ होने के बाद स्वर्ण मंदिर गए भी। लोगो की श्रध्दा उनके डर से ज्यादा बड़ी थी लेकिन जो भी मंदिर के अंदर गए उनको मंदिर से बाहर आने में अब सेना की गोलियों से छलनी होने का दर लग रहा था।

मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार जो की भिंडरावाले को हलके में लेने की भूल कर रहे थे उन्हें लग रहा था की भिंडरावाला और उनके साथी फ़ौज की मात्र चहलकदमी से डर कर अपने आप सरेंडर कर देंगे और इसी बात को ध्यान में रखकर सेना के ऑफिसरों ने भिंडरावाला और उनके साथी को बार बार सरेंडर करने के लिए चेताया लेकिन इस चेतावनी का कोई फायदा नहीं हुआ।

4 जून 1984 ( जनरैल सिंह भिंडरावाले द्वारा गोलीबारी की शुरुआत )

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स्वर्ण मंदिर के अंदर से सुबह सुबह बंदूकों के चलने की आवाजे आने लगी ,ग्रेनेड से हमला होने लगा इतना सब होने के बाद भी भारतीय सेना के द्वारा ज्यादा गोलीबारी नहीं की गयी थी क्योकि भारतीय सेना ये समझना चाहती थी की मंदिर के अंदर गुसपैठिये कितना बारूद रख कर बैठे है और उनके पास कौन कौन से हथियार है।

सेना ने मंदिर में घुसे हुए लोगो से बाहर आने के लिए कहा और उनके सुरक्षा का वादा भी किया।

5 जून 1984 (दोनों तरफ से गोलीबारियों की शुरुआत )

सुबह 7 बजे तक सेना के चेतावनी और सुरक्षा का वादे सुनने के बाद मंदिर के परिसर से लगभग 129 लोग बाहर आ गये। लोगो ने बाहर आकर बताया की मंदिर के अंदर भिंडरावाले एवं उनके साथी लोगो को मंदिर के बाहर नहीं आने दे रहे थे और उनको रोक रहे थे।

शाम को 7 बजे सेना ने अपनी करवाई करनी शुरू की और सेना के गोलीबारी के जबाब में भिंडरावाले एवं उनके साथीयो ने भी खूब गोलिबारी की।

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गोलीबारी में बर्बाद हुआ सिख पुस्तकालय

दोनों तरफ से की जा रही गोलीबारी में मंदिर को काफी नुकसान पंहुचा,सिख पुस्तकालय जल गया और  अकालतख्त को भारी मात्रा में नुकसान पंहुचा।

आर्मी के द्वारा अकालतख्त पर हमला करने से भिंडरावाले एवं उनके साथी एकदम घबरा गए क्योकि उनके इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था की भारतीय सेना अपनी करवाई पूरी करने के लिए स्वर्णमंदिर एवं अकालतख्त पर भी गोली चला सकती है।

लगातार हो रही गोलीबारी से भारतीय सैनिक मारे जा रहे थे चारो तरफ खून ही खून और भूरे कपड़ो में लाशे पड़ी हुयी थी जिन्हे लगातार गाड़ियों में ढोके बाहर निकला जा रहा था।

जो भी लोग भिंडरावाले का साथ दे रहे थे सब मारे जा चुके थे बस कुछ गिने समर्थक ही अपनी जान बचाने के लिए मंदिर के अंदर इधर उधर भाग रहे थे।

6 जून 1984 ( जनरैल सिंह भिंडरावाले की मौत )

सुबह 8 बजे के आसपास गोलीबारी में थोड़ी कमी आयी भारतीय सेना के 3 टैंक मंदिर के परिसर के बाहर खड़े थे।

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क्लॉक टावर

भिंडरावाले कुछ समर्थक क्लॉक टावर के ऊपर चढ़कर फ़ौज पर गोलिया चला रहे थे जिन्हे सेना ने मार गिराया। कुछ देर के लिए कर्फ्यू हटा दिया गया था लोग अपने घरो से बाहर आकर हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कोई अपने घर की छत से सारे मंजर का मुआयना कर रहा था तो कोई अपनी आँखों में आँशु लिए रो रहा था।

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कोटवाली और जलियांवाला बाग के पास चार टेंक एवं घंटाघर के बाहर 3 टेंक खड़े थे। शाम हो चुकी थी और एक अजीब सा माहौल बना हुआ था आज गोलीबारी पहले दिनों से ज्यादा थी। भिंडरावाले, शाहबेग सिंह और अमरीक सिंह मरने से पहले सेना के साथ दो दो हाथ करने का मन बना चुके थे।

भिंडरावाले और उनके साथी अकालतख्त के निचे छुपे हुए थे भारतीय सेना द्वारा ग्रेनेड का इस्तेमाल किया जो अकालतख्त के निचे  भिंडरावाले तक जा पंहुचा और उसकी मौत का कारण बना.

7 जून 1984 ( जनरैल सिंह भिंडरावाले की मौत की सूचना )

आकाशवाणी के द्वारा सुचना दी गयी जनरैल सिंह भिंडरावाले मारा जा चुका है और उसकी लाश मिल गयी है और दोपहर के 3 से 5 तक कर्फ्यू हटा दिया जायेगा। लेकिन लोगो की भारी भीड़ के कारण कर्फ्यू को जारी रखा गया क्योकि सेना को मालूम था की लोगो की भीड़ जब अपने सबसे पवित्र मंदिर का हाल अपनी आँखों से देखेगी तो दंगा भड़क उठेगा ओर उसे रोकना किसी तूफान से कम नहीं होगा।

8 जून से 10 जून 1984 ( ऑपरेशन ब्लू स्टार का अंतिम दिन )

सेना ने तहखानों में छिपे हुए चार ओर सिखो से लड़ाई की और 10 जून की दोपहर तक यह मिशन पूरा हो चुका था।

ऑपरेशन ब्लू स्टार में हुयी मौतों का आकंड़ा –

सरकारी आंकड़ों के मुताबित 300 से 400 लोग मारे गए थे और 90 भारतीय सेनिको को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था लेकिन हकीकत में ये आंकड़ा कुछ ओर ही था चश्मदीद लोगो की बयानों और दूसरी अन्य रिपोर्ट के मुताबित ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए लोगो की संख्या 300 या 400 नहीं बल्कि 1000 से ऊपर थी और सेना के जवानो के मौतों की संख्या भी 250 से 300 के आस पास थी।

प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या –

ऑपरेशन ब्लू स्टार को इस्तेमाल करने का आदेश प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा दिया गया था और जिसके तहत सिखो के सबसे पवित्र मंदिर को नुकसान पंहुचा हजारो की संख्या में सिख लोग मारे गए कई सिख धर्म गुरुयो को मार दिया इन सब बातों से सिख समुदाय बहुत ज्यादा आहत हो गया था और उनकी धार्मिक भावनाओ को बहुत चोट पहुंची।

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इंदिरा गाँधी का शव

इंदिरा गाँधी की परसनल सुरक्षा के लिए जिन गार्डो को तैनात किया था वो भी एक सिख थे जिनकी भावनाये भी इस ऑपरेशन से बहुत ज्यादा आहत हुयी थी और अपनी इन्ही आहत भावनाओ के चलते गुस्से में उनके गार्डो ने इंदिरा गाँधी को अपनी बन्दूक की गोलियों से छलनी छलनी करके उनको मौत के घाट उतार दिया था।

प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या की हत्या के बाद शुरू हुए 1984 के सिख विरोधी दंगे ।

FAQ

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय भारत का प्रधानमंत्री कौन था ?

ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय इन्दिरागांधी भारतीय प्रधानमंत्री थी

ऑपरेशन ब्लू स्टार के क्या परिणाम सामने आए ?

सिखो की भावनाये आहत हुयी और इन्दिरागांधी को उनके सिख गार्डो ने गोलियां मारके हत्या कर दी

कितने सैनिकों ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए ?

मारे गए सैनिको की संख्या 500 के आसपास थी

भिंडरावाले की मौत कब हुई ?

जनरैल सिंह भिंडरावाले को 6 जून 1984 ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान मार दिया गया था

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अंतिम कुछ शब्द –

दोस्तों मै आशा करता हूँ आपको ”ऑपरेशन ब्लू स्टार ,इंदिरा गाँधी की मौत की वजह ।Operation Blue Star”वाला Blog पसंद आया होगा अगर आपको मेरा ये Blog पसंद आया हो तो अपने दोस्तों और अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर करे लोगो को भी इसकी जानकारी दे

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