सैयद अब्दुल रहीम का जीवन परिचय ,मूवी, कहानी।Syed Abdul Rahim

सैयद अब्दुल रहीम का जीवन परिचय ,मूवी, कहानी। Syed Abdul Rahim Biography in hindi

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सैयद अब्दुल रहीम भारत के अब तक के सबसे महान फुटबॉल कोच थे. अब्दुल रहीम जिसे रहीम साब के नाम से भी जाना जाता है, 1950 से 1963 में अपनी मृत्यु तक एक भारतीय फुटबॉल कोच और भारतीय राष्ट्रीय टीम के प्रबंधक और एक पूर्व खिलाड़ी थे। 

उन्हें आधुनिक भारतीय फुटबॉल का वास्तुकार माना जाता है। मूल रूप से पेशे से एक शिक्षक, वह एक अच्छे प्रेरक थे और एक कोच के रूप में उनके कार्यकाल को भारत में फुटबॉल का “स्वर्ण युग” माना जाता है। 

उन्होंने 1956 के मेलबर्न ओलंपिक फुटबॉल टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में भारतीय टीम का नेतृत्व किया, जिससे भारत इस स्थान को हासिल करने वाला पहला एशियाई देश बन गया।

उनकी कोचिंग के लिए उनका धन्यवाद, वर्ष 1945 से 1965 को “हैदराबाद फुटबॉल का स्वर्ण युग” माना जाता है और वर्ष 1951 और 1962 को “भारतीय फुटबॉल का स्वर्ण युग” माना जाता है।

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सैयद अब्दुल रहीम

सैयद अब्दुल रहीम का जीवन परिचय

Table of Contents

नाम (Name)सैयद अब्दुल रहीम
निक नेम (Nick name )रहीम साब, द आर्किटेक्ट ऑफ़ मॉडर्न इंडियन फ़ुटबॉल, द स्लीपिंग जाइंट, द स्टेन कलिस ऑफ़ इंडिया, द इंडियन फर्ग्यूसन
प्रसिद्दि (Famous for )1956 के मेलबर्न ओलंपिक फुटबॉल टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में भारतीय टीम को कोचिंग देना
जन्मदिन (Birthday)17 अगस्त 1909
मृत्यु की तारीख Date of Death11 जून 1963
मृत्यु की जगह (Place of Death)भारत
मृत्यु का कारण (Death Cause)कैंसर
आयु (Age)53 वर्ष (मृत्यु के समय )
जन्म स्थान (Birth Place)हैदराबाद, भारत
गृह नगर (Hometown)हैदराबाद, भारत
शिक्षा (Education) स्नातक
स्कूल (School )उस्मानिया विश्वविद्यालय, भारत
कॉलेज (College)ज्ञात नहीं
धर्म (Religion)इस्लाम
नागरिकता (Nationality )भारतीय
राशि (Zodiac)सिंह
आंखो का रंग (Eye Colour) काला
बालों का रंग (Hair Colour)काला
पेशा (Occupation)फुटबॉल कोच, शिक्षक
वैवाहिक स्थिति (Marital Status)  विवाहित

सैयद अब्दुल रहीम का शुरुवाती जीवन ( Early Life )

सैयद अब्दुल रहीम का जन्म 17 अगस्त 1909 को हैदराबाद, भारत में हुआ था। उन्होंने उस्मानिया यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। 

रहीम बचपन से ही फुटबॉल की ओर आकर्षित थे और उसी में उन्होंने खुद को कुशल बनाया। स्कूल के दिनों में वह स्पोर्ट्स इवेंट में हिस्सा लिया करते थे। 

सैयद अकादमिक और एथलेटिक्स में प्रतिभाशाली थे। फ़ुटबॉल की संस्कृति कई युवाओं में रुचि जगाती है, जिसमें रहीम भी शामिल है, जब वह 1920 के मध्य में हैदराबाद में आये थे ।

रहीम ने उस्मानिया विश्वविद्यालय की फ़ुटबॉल टीम के लिए फ़ुटबॉल खेलना शुरू किया। 1940 की शुरुआत में, रहीम हैदराबाद के कमर क्लब में सर्वश्रेष्ठ टीमों में से एक के लिए खेले ।

सैयद अब्दुल रहीम का परिवार (Syed Abdul Rahim Family )

सैयद अब्दुल रहीम शादीशुदा थे और उनका एक बेटा सैयद शाहिद हकीम था जो पूर्व ओलंपिक फुटबॉल खिलाड़ी और फीफा अधिकारी है।

सैयद अब्दुल रहीम  का करियर ( Syed Abdul Rahim Career )

आधुनिक भारतीय फुटबॉल की शुरुआत की

उन्होंने एक स्कूल शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया, लेकिन अपना पहला प्यार “फुटबॉल” कभी नहीं छोड़ा और 1920 के दशक से 1940 के दशक की शुरुआत तक हैदराबाद के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते थे, जब वे ‘कमर क्लब’ के लिए खेलते थे, जो उस समय की हैदराबाद की स्थानीय लीग में सर्वश्रेष्ठ टीमों में से एक थी

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भारतीय फुटबॉल टीम

उनका फुटबॉल करियर 1943 से 1963 तक हैदराबाद सिटी पुलिस के कोच और सचिव के रूप में शुरू हुआ।  रहीम शानदार उम्मीदवारों का चयन करने और उन्हें शानदार खिलाडी बनाने के लिए मशहूर थे । 

जब 1943 में, रहीम हैदराबाद शहर पुलिस के कोच बने थे उन्होंने गेंद को पास करने और पैर से खेलने की तकनीक पेश की। रहीम अक्सर फुटबॉल टूर्नामेंट आयोजित करते थे ताकि खिलाड़ी अपनी सहनशक्ति, गति और तकनीकों को बढ़ा सकें।

एश गोल्ड कप का आयोजन बेंगलुरु में किया गया था, जिसमें रहीम अपनी टीम को प्रतियोगिता में लेकर आए। HCP प्रमुखता में तब आया जब टीम ने रॉयल एयर फ़ोर्स के विरुद्ध फ़ाइनल जीती। 

1950 के डूरंड कप के फाइनल में मोहन बागान को हराकर वे उस समय की अच्छी तरह से स्थापित बंगाल फुटबॉल टीमों को चुनौती देने में भी कामयाब रहे।

उनकी बेहतरीन कोचिंग के तहत एचसीपी टीम ने लगातार 5 रोवर्स कप जीते, जो आज भी एक रिकॉर्ड है।

भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के प्रबंधक के रूप में करियर

वर्ष 1950 में, रहीम को भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के प्रबंधक के रूप में चयनित किये गए थे  । कोच बनने के बाद सैयद ने 1948 की ओलंपिक टीम को एक नई दिशा दी।

उन्होंने गैर-प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को टीम से बाहर निकल दिया और नये युवाओं का स्वागत किया। कोच सैयद अब्दुल रहीम के मार्गदर्शन में भारतीय टीम ईरान टीम के खिलाफ 1-0 से गोल्ड जीतने में सफल रही।

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भारतीय फुटबॉल टीम

जब 1952 में, ओलंपिक खेलों को थाफिनलैंड में आयोजित किया गया तब यूगोस्लाविया ने टीम इंडिया को 10-1 से हरा दिया था , इसके पीछे वजह यह थी कि भारतीय खिलाड़ी बिना जूतों के खेल रहे थे। बाद में, एआईएफएफ (अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ) ने घोषणा की कि खिलाड़ियों को भारत के लिए खेलते समय जूते पहनने होंगे।

ऐसा कहा गया था कि 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भारत के शर्मनाक प्रदर्शन के बाद, एआईएफएफ के ऊचे पदों पर बैठे अधिकारीयो ने हस्तक्षेप किया और रहीम को अपनी पसंद की टीम चुनने से रोक दिया।

अंतिम दिनों में उनका फुटबॉल टीम के लिए योगदान

1958 तक हैदराबाद और आंध्र को एआईएफएफ द्वारा अलग-अलग भाग माना जाता था। लेकिन, 1959 में, इन दोनों भागो को आंध्र प्रदेश फुटबॉल एसोसिएशन में मिला दिया गया था, और रहीम ने इसे होने देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

1960 के रोम ओलंपिक में भारत की लड़ाई की भावना ने उन्हें जकार्ता में 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने के लिए पसंदीदा में से एक बना दिया।

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भारतीय फुटबॉल टीम

भारत को टूर्नामेंट में अच्छी शुरुआत नहीं मिली; वे दक्षिण कोरिया से 2-1 से हार गए, लेकिन भारत अगले ही गेम में जापान पर 2-0 से जीत के साथ वापसी करने में सफल रहा। अंतिम ग्रुप गेम में, भारत ने थाईलैंड को 4-1 से हराया और अगले चरण में आगे बढ़ गया।

1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने की भारत की राह बाधाओं से भरी थी; जैसा कि विभिन्न वैश्विक राजनीतिक कारणों से, अधिकांश भारतीय एथलीट वापस चले गए और भारतीय फुटबॉल टीम ने खुद को संकट में पाया।

बड़े फाइनल से एक रात पहले भारतीय टीम की नींद उड़ी हुई थी। दूसरी तरफ, कैंसर से पीड़ित सैयद अब्दुल रहीम ने अपनी टीम को जकार्ता की सड़कों पर ले गए और कहा, ” मुझे कल आपसे एक तोहफा चाहिए….स्वर्ण पदक।”

उनकी प्रेरणा के शब्दों ने संघर्षरत भारतीय टीम का उत्साह बढ़ाया और फाइनल में घायल जरनैल सिंह को स्ट्राइकर के रूप में खेलकर दक्षिण कोरियाई टीम को चौंका दिया, जो अपने कॉलेज के दिनों में सेंटर-फॉरवर्ड के रूप में खेलते थे।

रहीम के जोखिम का भुगतान तब हुआ जब उनके द्वारा चुने गए चोट से घायल हुए जरनैल ने हाफटाइम से पहले भारत को 2-0 से आगे कर दिया।

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स्वर्ण पदक जीतने के बाद भारतीय फुटबॉल टीम

भारतीय टीम मजबूती के साथ खेलती रही और दूसरे हाफ में दक्षिण कोरिया टीम को केवल एक गोल करने दिया और इस तरह भारत ने फाइनल में दक्षिण कोरिया को 100,000 की भीड़ के सामने हराकर स्वर्ण पदक जीता था।

सैयद अब्दुल रहीम की मृत्यु ( Syed Abdul Rahim death)

महान सैयद अब्दुल रहीम का 11 जून 1963 को कैंसर से निधन हो गया। वह आधुनिक भारतीय फुटबॉल के आविष्कारक थे। उनकी मृत्यु के बाद, भारतीय फुटबॉल टीम के खेल में लगातार गिरावट आई।

फिल्म (Movie ) :मैदान (Maidaan)

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फिल्म (Movie ) :मैदान

रहीम पर आधारित एक बायोपिक जिसका नाम मैदान है. फिल्म अभिनेता अजय देवगन महान फुटबॉल कोच की भूमिका निभाते नजर आएंगे।

फिल्म मैदान भारतीय फुटबॉल के स्वर्ण युग (1952-1962) पर आधारित एक आगामी भारतीय हिंदी भाषा की जीवनी पर आधारित खेल फिल्म है और इसमें अजय देवगन ने फुटबॉल कोच सैयद अब्दुल रहीम की भूमिका निभाई है।

मैदान फिल्म की शूटिंग 19 अगस्त 2019 को शुरू हुई थी और अब फिल्म 15 अक्टूबर 2021 को दुनिया भर के सिनेमाघरों में दशहरा त्यौहार के साथ रिलीज होने वाली है। यह फिल्म बोनी कपूर द्वारा निर्मित और विज्ञापन फिल्म निर्देशक अमित शर्मा द्वारा निर्देशित है।

FAQ

सैयद अब्दुल रहीम कौन थे ?

सैयद अब्दुल रहीम भारतीय फुटबॉल टीम के महान फुटबॉल कोच थे.

सैयद अब्दुल रहीम की मृत्यु कब हुई ?

सैयद अब्दुल रहीम की मृत्यु 11 जून 1963 को कैंसर की बीमारी के कारण हुई।

सैयद अब्दुल रहीम की डेथ कब हुई ?

सैयद अब्दुल रहीम डेथ 11 जून 1963 को कैंसर की बीमारी के कारण हुई।

सैयद अब्दुल रहीम का जन्म कब हुआ था ?

सैयद अब्दुल रहीम का जन्म 17 अगस्त 1909 को हैदराबाद में हुआ था।

सैयद अब्दुल रहीम का धर्म क्या है ?

सैयद अब्दुल रहीम इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखते थे।

सैयद अब्दुल रहीम की कहानी क्या है ? 

सैयद अब्दुल रहीम भारतीय फुटबॉल टीम के महान कोच थे जो भारतीय फूटबाल टीम को उचाईयो तक ले गए थे।

सैयद अब्दुल रहीम की कहानी पर बनी बायोपिक फिल्म कौन सी है ?

सैयद अब्दुल रहीम की कहानी पर बनी बायोपिक फिल्म का नाम मैदान है जिसमे सैयद अब्दुल रहीम का किरदार अभिनेता अजय देवगन निभाएंगे।

अंतिम कुछ शब्द 

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