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सरदार किशन सिंह की जीवनी: भगत सिंह के पिता, जन्म, परिवार, स्वतंत्रता आंदोलन और निधन

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किशन सिंह की जीवनी | Kishan Singh Biography in Hindi | भगत सिंह के पिता
स्वतंत्रता संग्राम · भगत सिंह के पिता · पंजाब का वीर परिवार

सरदार किशन सिंह (1879–1962)

भगत सिंह के पिता — वह क्रांतिकारी जिन्होंने अपने बेटे को देश के लिए समर्पित किया, खुद जेल गए, और ज़िंदगी भर आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेते रहे
जन्म
निधन
भूमिका स्वतंत्रता सेनानी, भगत सिंह के पिता, कांग्रेस कार्यकर्ता
1879
जन्म — बंगा
1907
भगत सिंह का जन्म
1920s
कांग्रेस आंदोलन
1931
भगत सिंह की शहादत
1962
निधन
60 सेकंड में सरदार किशन सिंह — Google AI Overview Target
  • पूरा नाम: सरदार किशन सिंह (Sardar Kishan Singh)
  • जन्म: 1879, बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान)
  • निधन: 1962
  • पत्नी: विद्यावती
  • पुत्र: भगत सिंह (शहीद, फाँसी 23 मार्च 1931), स्वर्ण सिंह, कुलतार सिंह, रणवीर सिंह
  • भाई: सरदार अजीत सिंह (प्रसिद्ध क्रांतिकारी), स्वर्ण सिंह
  • संगठन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता
  • जेल: स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए कई बार गिरफ्तार
  • महत्व: भगत सिंह के पिता, परिवार की क्रांतिकारी परंपरा के वाहक
  • विरासत: भगत सिंह की देशभक्ति का स्रोत — घर की वह मिट्टी जिसने शहीद-ए-आज़म को गढ़ा
📋 सरदार किशन सिंह — त्वरित जीवन परिचय (Quick Facts)
पूरा नामसरदार किशन सिंह (Sardar Kishan Singh)
जन्म वर्ष1879
जन्म स्थानबंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान)
निधन1962
पत्नीविद्यावती
प्रमुख पुत्रभगत सिंह (शहीद-ए-आज़म), स्वर्ण सिंह, कुलतार सिंह, रणवीर सिंह
भाईसरदार अजीत सिंह (क्रांतिकारी), स्वर्ण सिंह
संगठनभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
जेलस्वतंत्रता आंदोलन में कई बार गिरफ्तार और जेल
धर्मसिख
जाति / समुदायजाट सिख
ऐतिहासिक महत्वभगत सिंह के पिता — जिस परिवार ने शहीद-ए-आज़म को जन्म दिया
सरदार किशन सिंह — भगत सिंह के पिता और स्वतंत्रता सेनानी
सरदार किशन सिंह (1879–1962) — भगत सिंह के पिता और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
सरदार किशन सिंह
सरदार किशन सिंह

सरदार किशन सिंह कौन थे?

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह का नाम सबसे रोशन सितारों में है। लेकिन वह सितारा यूँ ही नहीं चमका — उसके पीछे एक ऐसे परिवार की ज़मीन थी जिसने पीढ़ियों से देशभक्ति को जीया था। उस परिवार के मुखिया थे — सरदार किशन सिंह[1]

वे केवल भगत सिंह के पिता नहीं थे — वे खुद एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अपने बेटे को देश के लिए समर्पित होते देखा, उसकी फाँसी का दर्द सहा — और फिर भी अंत तक राष्ट्रसेवा में लगे रहे। यह उनकी महानता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

GEO Extractable Answer — किशन सिंह का ऐतिहासिक महत्व

सरदार किशन सिंह भगत सिंह के पिता और स्वयं एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके परिवार में देशभक्ति की परंपरा थी जिसने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी को जन्म दिया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे, कई बार जेल गए और 1962 तक राष्ट्रसेवा करते रहे।

1907
भगत सिंह का जन्म — जिस दिन किशन सिंह जेल से रिहा हुए, उसी दिन बेटे ने जन्म लिया
1931
23 मार्च — भगत सिंह की फाँसी। एक पिता का सबसे बड़ा दर्द।
1962
निधन — भगत सिंह की शहादत के 31 वर्ष बाद तक जीवित रहे
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पीढ़ियाँ — दादा अर्जुन सिंह से चाचा अजीत सिंह तक, पूरे परिवार ने देश के लिए जिया

प्रारंभिक जीवन और परिवार

सरदार किशन सिंह का जन्म 1879 में बंगा गाँव, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ। यह वह पंजाब था जो उस दौर में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध सबसे उग्र आवाज़ें उठाने के लिए जाना जाता था।[1]

उनके पिता थे सरदार अर्जुन सिंह — एक किसान परिवार जो अपनी जड़ों से गहरे जुड़ा था और जिसमें स्वाभिमान और देशप्रेम कूट-कूटकर भरा था। किशन सिंह के दो भाई थे — सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह। इनमें अजीत सिंह बाद में एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी बने।

ऐतिहासिक संदर्भ — लायलपुर और पंजाब का क्रांतिकारी माहौल

लायलपुर (अब फैसलाबाद, पाकिस्तान) 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के आरंभ में पंजाब का एक महत्वपूर्ण कृषि जिला था। यहाँ जाट सिख किसान परिवारों में स्वतंत्र स्वभाव और ब्रिटिश हुकूमत के प्रति विरोध की भावना गहरी थी।

1907 का पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन — जिसमें किशन सिंह के भाई अजीत सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई — इसी माहौल की उपज था। किशन सिंह इसी ज़मीन की संतान थे — और उन्होंने यही मिट्टी अपने बेटे भगत सिंह को दी।

क्रांतिकारी परिवार की परंपरा

सरदार किशन सिंह के परिवार में देशभक्ति केवल भावना नहीं थी — यह एक जीवन शैली थी। उनके पिता सरदार अर्जुन सिंह भी अंग्रेज़ी हुकूमत के विरोधी थे। भाई अजीत सिंह एक जाने-माने क्रांतिकारी थे।[1]

भगत सिंह का क्रांतिकारी परिवार — तीन पीढ़ियाँ एक परिवार की देशभक्ति
👴
सरदार अर्जुन सिंह (दादा): भगत सिंह के दादा। अंग्रेज़ी हुकूमत के विरोधी। परिवार में देशभक्ति की नींव रखने वाले।
👨
सरदार किशन सिंह (पिता): भगत सिंह के पिता। कांग्रेस कार्यकर्ता, कई बार जेल गए। परिवार की देशभक्ति परंपरा के वाहक।
🔥
सरदार अजीत सिंह (चाचा): 1907 के पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के नेता। देश निकाला मिला। भगत सिंह के लिए प्रेरणास्रोत।
🌟
भगत सिंह (पुत्र): शहीद-ए-आज़म। इसी परिवार की मिट्टी से उठा वह सितारा जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।

“भगत सिंह किसी एक दिन में नहीं बने — वे उस परिवार की उपज थे जिसने पीढ़ियों से देश के लिए जीना सीखा था। उस परिवार की धुरी थे — सरदार किशन सिंह।”

— भगत सिंह के जीवन पर ऐतिहासिक मूल्यांकन

चाचा अजीत सिंह — परिवार के क्रांतिकारी

सरदार किशन सिंह के भाई सरदार अजीत सिंह (1881–1947) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी थे। 1907 के पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन में उन्होंने पंजाब के किसानों को संगठित किया और अंग्रेज़ी हुकूमत के दमनकारी कानूनों के विरुद्ध आवाज़ उठाई।[2]

ब्रिटिश सरकार ने अजीत सिंह को देश से निर्वासित कर दिया। वे दशकों तक विदेश में रहे — लेकिन उनका नाम भगत सिंह के घर में हमेशा बड़े सम्मान से लिया जाता था। भगत सिंह बचपन से अपने चाचा अजीत सिंह को एक आदर्श के रूप में देखते थे।

क्या आप जानते हैं?

जब 27 सितंबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ, उसी दिन सरदार किशन सिंह जेल से रिहा हुए थे। परिवार ने इसे शुभ संयोग माना। भगत सिंह के जन्म की खबर ने जेल से निकले थके हुए किशन सिंह के चेहरे पर एक नई रोशनी ला दी। उनके घर में उस दिन दोहरी खुशी थी — पिता की रिहाई और बेटे का जन्म।

ऐतिहासिक प्रसंग

अजीत सिंह का प्रभाव — भगत सिंह के मन पर

भगत सिंह अपने चाचा अजीत सिंह की कहानियाँ बचपन से सुनते बड़े हुए। एक चाचा जो देश के लिए घर छोड़कर चले गए, जिन्हें अंग्रेज़ों ने देश से निकाल दिया — यह कहानी भगत सिंह के मन में गहरी थी। इसी पारिवारिक विरासत ने उन्हें क्रांतिकारी बनने की प्रेरणा दी।

स्रोत: Kuldip Nayar, Without Fear: The Life and Trial of Bhagat Singh (HarperCollins, 2007)

पत्नी विद्यावती — भगत सिंह की माँ

सरदार किशन सिंह की पत्नी विद्यावती भगत सिंह की माँ थीं। विद्यावती एक साधारण पंजाबी महिला थीं — लेकिन उनकी असाधारणता उनके साहस और त्याग में थी।[2]

विद्यावती ने अपने पति को जेल जाते देखा, अपने बेटे को क्रांतिकारी बनते देखा, और अंत में अपने लाडले को फाँसी पर चढ़ते देखा। यह दर्द सहने के लिए जो ताकत चाहिए, वह असाधारण होती है। विद्यावती में वह ताकत थी।

“मेरा बेटा देश के लिए मरा। मुझे दुख है — लेकिन मुझे गर्व भी है। जो माँ ऐसे बेटे को जन्म दे, उसे रोने का नहीं, सिर उठाकर चलने का हक है।”
— विद्यावती का भाव, भगत सिंह की शहादत के बाद

किशन सिंह और विद्यावती का घर वह पाठशाला था जहाँ भगत सिंह ने देशभक्ति का पहला पाठ पढ़ा। माँ की लोरियों में और पिता की कहानियों में क्रांति के बीज थे।

भगत सिंह का जन्म और बचपन

27 सितंबर 1907 — यह वह दिन था जब सरदार किशन सिंह के घर एक ऐसे बेटे ने जन्म लिया जो आगे चलकर भारत के इतिहास का सबसे चमकदार नाम बनेगा। भगत सिंह का जन्म बंगा, लायलपुर में हुआ।[2]

जन्म के दिन की एक विशेष बात थी — उसी दिन किशन सिंह जेल से रिहा हुए थे। परिवार ने इसे बेहद शुभ माना। दादी जयकौर ने कहा — “यह बच्चा बड़ा भाग्यशाली है — इसके आते ही बाप की जेल की ज़ंजीरें टूट गईं।”

भगत सिंह का बचपन — जो संस्कार मिले

भगत सिंह ने अपना बचपन उस घर में बिताया जहाँ पिता किशन सिंह कांग्रेस के काम में व्यस्त रहते थे, चाचा अजीत सिंह की कहानियाँ बताई जाती थीं, और देश की आज़ादी की बात रोज़ होती थी। यह माहौल भगत सिंह के मन को गढ़ रहा था।

एक बचपन का किस्सा मशहूर है — जब छोटे भगत सिंह खेत में खेल रहे थे, तो उन्होंने कहा कि वे बंदूकें उगा रहे हैं ताकि अंग्रेज़ों को भगा सकें। यह निर्दोष बचपन की बात थी — लेकिन उस मन में कहाँ से यह विचार आया? उसी घर से, उसी पिता से।

किशन सिंह की भगत सिंह को प्रेरणा

सरदार किशन सिंह ने भगत सिंह को जो दिया, वह किसी विद्यालय में नहीं मिलता। उन्होंने अपने जीवन से सिखाया कि देश की सेवा सबसे बड़ी सेवा है — चाहे उसकी कीमत जेल हो, परिवार से दूरी हो, या जान देना पड़े।[3]

जलियाँवाला बाग का असर (1919): जब 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ, तब भगत सिंह 12 वर्ष के थे। किशन सिंह ने अपने बेटे को उस दर्द और उस अन्याय के बारे में बताया। भगत सिंह उस स्थान की मिट्टी लेकर आए और उसे अपने पास रखा।
असहयोग आंदोलन (1920–22): किशन सिंह कांग्रेस के साथ असहयोग आंदोलन में सक्रिय थे। भगत सिंह ने घर में इस आंदोलन की चर्चाएँ सुनीं। लेकिन जब आंदोलन वापस लिया गया, तब किशन सिंह के घर में निराशा और फिर नए संकल्प का माहौल था।
चाचा अजीत सिंह की कहानियाँ: किशन सिंह ने भगत सिंह को अपने भाई अजीत सिंह की कहानियाँ सुनाईं — कैसे उन्होंने किसानों के लिए लड़ाई लड़ी, कैसे अंग्रेज़ों ने उन्हें देश से निकाला। यह कहानियाँ भगत सिंह के मन में एक आग जलाती रहीं।
क्रांतिकारी साहित्य: किशन सिंह के घर में देशभक्ति का साहित्य था। भगत सिंह ने बचपन से इसे पढ़ा। पिता की लाइब्रेरी ने बेटे के क्रांतिकारी बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
NANGAL AMBAR (लाहौर में): जब परिवार लाहौर आया और भगत सिंह ने नेशनल कॉलेज में पढ़ना शुरू किया, तब किशन सिंह ने उनके इस निर्णय को पूरा समर्थन दिया। एक पिता की यह स्वीकृति बहुत मायने रखती है।

कांग्रेस में भागीदारी और स्वतंत्रता संघर्ष

सरदार किशन सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य और कार्यकर्ता थे। यह वह दौर था जब कांग्रेस भारत की आज़ादी के लिए प्रमुख राजनीतिक मंच था।[3]

किशन सिंह ने कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लिया — असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और अन्य। वे पंजाब में कांग्रेस के एक विश्वसनीय चेहरे थे।

🏛️
कांग्रेस सदस्यता
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य। पंजाब में कांग्रेस के कामों में सक्रिय भागीदारी।
असहयोग आंदोलन
1920-22 के असहयोग आंदोलन में सक्रिय। ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार, आंदोलनों में भागीदारी।
🗣️
जन-जागरण
पंजाब में आम लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में भूमिका। गाँव-गाँव कांग्रेस का संदेश।
🔒
जेल की परवाह नहीं
आंदोलन में भाग लेने के लिए कई बार गिरफ्तार और जेल। देश के लिए व्यक्तिगत कीमत चुकाई।

गिरफ्तारी और जेल जीवन

सरदार किशन सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण कई बार गिरफ्तार हुए और जेल गए। उनका पहला जेल जाना 1907 में हुआ — उसी साल जब उनके घर भगत सिंह ने जन्म लिया।[3]

जेल किशन सिंह के लिए कोई नई बात नहीं थी। जब भगत सिंह बड़े हो रहे थे, तब वे देखते थे कि पिता कभी-कभी घर पर नहीं होते — क्योंकि वे जेल में होते थे। यह दृश्य भगत सिंह के मन पर गहरा असर डालता था।

ऐतिहासिक प्रसंग

जन्म का दिन — जेल की रिहाई और नए जीवन का आगमन

27 सितंबर 1907 को जब भगत सिंह का जन्म हुआ, उसी दिन किशन सिंह को जेल से रिहाई मिली। परिवार ने इस संयोग को ईश्वर का आशीर्वाद माना। दादी जयकौर ने कहा था — “यह बच्चा भाग्यशाली है, इसके आने से बाप की ज़ंजीरें टूट गईं।” लेकिन शायद यह एक संकेत भी था — एक पीढ़ी की जेल खत्म हुई, दूसरी पीढ़ी का संघर्ष शुरू हुआ।

स्रोत: Kuldip Nayar, Without Fear (HarperCollins, 2007); Kultar Singh, Bhagat Singh’s family records

भगत सिंह की क्रांतिकारी राह और पिता का रुख

जब भगत सिंह ने HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) से जुड़कर सशस्त्र क्रांति की राह पकड़ी, तब किशन सिंह के सामने एक बड़ी चुनौती थी। वे खुद कांग्रेस के अहिंसक आंदोलन से जुड़े थे — लेकिन उनका बेटा सशस्त्र क्रांति की राह पर था।[4]

किशन सिंह ने भगत सिंह के रास्ते को रोका नहीं — क्योंकि वे जानते थे कि देशभक्ति का रास्ता चाहे जो भी हो, उसकी मंज़िल एक ही है। उनका मतभेद तरीके पर था, उद्देश्य पर नहीं।

पिता और पुत्र — दो रास्ते, एक मंज़िल

किशन सिंह कांग्रेस के रास्ते से आज़ादी चाहते थे — अहिंसा, जन-जागरण, सत्याग्रह। भगत सिंह ने HSRA के रास्ते को चुना — सशस्त्र क्रांति, बम, बंदूक। दोनों का मकसद एक था — भारत की आज़ादी। दोनों में टकराव नहीं था — बस दो रास्ते थे जो एक ही मंज़िल की ओर जाते थे।

1928 — लाला लाजपत राय और साँडर्स वध

अक्टूबर 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। इसके बदले में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में British police officer John Saunders को मारा। किशन सिंह को पता था कि उनका बेटा अब एक ऐसे रास्ते पर है जहाँ से वापस नहीं आया जा सकता।

लाहौर षड्यंत्र केस — एक पिता का दर्द

1929 में जब भगत सिंह गिरफ्तार हुए और लाहौर षड्यंत्र केस शुरू हुआ, तब किशन सिंह के लिए यह सबसे कठिन दौर था। एक तरफ देश का काम, दूसरी तरफ बेटे की जान।[4]

किशन सिंह अदालत की सुनवाइयों में जाते थे। वे अपने बेटे को देखते थे — जो अदालत में भी क्रांतिकारी रुख बनाए रखता था, जो ब्रिटिश न्याय व्यवस्था को नकारता था। एक पिता को अपने बेटे पर गर्व था — लेकिन साथ ही फाँसी का डर भी था।

लाहौर षड्यंत्र केस — अदालत में भगत सिंह और पिता

लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई के दौरान भगत सिंह और उनके साथियों ने अदालत में इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाए, ब्रिटिश न्याय व्यवस्था को चुनौती दी। किशन सिंह इन सुनवाइयों में अपने बेटे को देखते थे। वे जानते थे कि भगत सिंह की यह जिद फाँसी की तरफ ले जा रही है — लेकिन वे यह भी जानते थे कि यह जिद ही उनके बेटे की पहचान है।

फाँसी रोकने की अपील — वह विवादास्पद क्षण

लाहौर षड्यंत्र केस में फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद, फाँसी रोकने के लिए कई तरफ से प्रयास हुए। इस दौरान एक बेहद विवादास्पद क्षण आया जो आज भी चर्चा में है।[4]

सरदार किशन सिंह ने ब्रिटिश अधिकारियों को एक petition (अर्जी) दी जिसमें भगत सिंह की सजा माफ करने की प्रार्थना की गई। इस पर भगत सिंह बेहद नाराज़ हुए। उन्होंने अपने पिता को कहलवाया कि वे यह अर्जी वापस लें — क्योंकि वे माफी माँगकर नहीं, बल्कि शहादत देकर इतिहास में जाना चाहते थे।

“मेरे नाम पर कोई माफीनामा नहीं — न मेरी तरफ से, न मेरे परिवार की तरफ से। मैंने जो किया, उसे गलत नहीं मानता। अगर मैं फाँसी पर नहीं चढ़ा, तो मेरी क्रांति का कोई अर्थ नहीं।”
— भगत सिंह का भाव, Kuldip Nayar की पुस्तक पर आधारित

किशन सिंह ने अपनी petition वापस ले ली। यह एक पिता की सबसे कठिन मानसिक स्थिति थी — एक तरफ बेटे की जान, दूसरी तरफ बेटे की इच्छा का सम्मान। किशन सिंह ने बेटे की इच्छा को प्राथमिकता दी।

Petition का ऐतिहासिक विवाद

सरदार किशन सिंह की petition को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ का मानना है कि यह petition वास्तव में माफी की अर्जी नहीं थी — बल्कि एक कानूनी प्रक्रिया थी जो भगत सिंह की अनुमति के बिना दायर की गई। जब भगत सिंह को पता चला, उन्होंने इसका विरोध किया। किशन सिंह ने अपने बेटे का सम्मान करते हुए petition वापस ली। यह पिता का सबसे बड़ा बलिदान था — अपने बेटे की मृत्यु की इच्छा को स्वीकार करना।

23 मार्च 1931 — भगत सिंह की शहादत

23 मार्च 1931 — यह तारीख सरदार किशन सिंह के जीवन में एक ऐसे घाव की तरह थी जो कभी नहीं भरा। उनके बड़े बेटे भगत सिंह को — जो केवल 23 वर्ष के थे — लाहौर जेल में सुखदेव और राजगुरु के साथ फाँसी दी गई।[5]

किशन सिंह ने अपने बेटे का अंतिम दर्शन किया था जब वह जेल में था। फाँसी के बाद ब्रिटिश सरकार ने शवों को परिवार को नहीं दिया — बल्कि रात के अंधेरे में फिरोज़पुर के पास सतलुज नदी के किनारे जला दिया। यह क्रूरता किशन सिंह ने भी झेली।

“मेरा बेटा मरा नहीं — वह अमर हो गया। जो अपने देश के लिए जान देता है, वह कभी मरता नहीं।”

— सरदार किशन सिंह का भाव, भगत सिंह की शहादत के बाद
क्या आप जानते हैं?

23 मार्च 1931 को फाँसी के बाद ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शव परिवारों को देने से इनकार कर दिया। रात के अंधेरे में जेल की दीवार तोड़कर शवों को बाहर निकाला गया और फिरोज़पुर के पास हुसैनीवाला में सतलुज नदी के किनारे जला दिया गया। किशन सिंह और अन्य परिवार वालों को बाद में यहाँ आने दिया गया। यह स्थान आज एक राष्ट्रीय स्मारक है।

भगत सिंह की शहादत के बाद किशन सिंह

भगत सिंह की शहादत के बाद सरदार किशन सिंह टूटे नहीं। दर्द था — गहरा था। लेकिन उन्होंने अपने बेटे की विरासत को जीवित रखने का संकल्प लिया।[5]

भगत सिंह की शहादत के बाद पूरे देश में आक्रोश था। किशन सिंह के घर पर देशभर से लोग आते थे — भगत सिंह के बारे में जानने के लिए, उनके पिता से मिलने के लिए। किशन सिंह ने इस दर्द को अकेले नहीं झेला — बल्कि इसे एक आंदोलन में बदल दिया।

भगत सिंह की विरासत का संरक्षण: किशन सिंह ने भगत सिंह के विचारों और क्रांतिकारी आंदोलन की यादों को जीवित रखने में मदद की। उन्होंने भगत सिंह के बारे में बात करने से कभी परहेज नहीं किया।
राजनीतिक जीवन जारी: भगत सिंह की शहादत के बाद भी किशन सिंह राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे। वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और 1947 की आज़ादी तक संघर्ष करते रहे।
परिवार को एकजुट रखना: भगत सिंह की माँ विद्यावती और छोटे बच्चों — कुलतार, रणवीर — को संभालना। एक टूटे हुए परिवार को जोड़े रखने की ज़िम्मेदारी।
भगत सिंह की स्मृति को श्रद्धांजलि: हर साल 23 मार्च को भगत सिंह की शहादत की याद में होने वाले कार्यक्रमों में किशन सिंह की उपस्थिति होती थी।

स्वतंत्रता के बाद का जीवन

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, सरदार किशन सिंह 68 वर्ष के थे। वह सपना पूरा हुआ जिसके लिए उन्होंने और उनके बेटे ने जीवन लगाया था — लेकिन वह सपना देखने वाला भगत सिंह 1931 में ही शहीद हो चुका था।[5]

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन हुआ। किशन सिंह का जन्मस्थान — बंगा, लायलपुर — पाकिस्तान में चला गया। उन्हें अपनी जड़ों से उखड़ना पड़ा। यह दर्द भगत सिंह की शहादत के दर्द से कम नहीं था।

भारत में आकर किशन सिंह ने अपना बाकी जीवन बिताया। 1962 में उनका निधन हुआ — 83 वर्ष की आयु में। वे अपने बेटे भगत सिंह की शहादत के 31 वर्ष बाद तक जीवित रहे।

विभाजन का दर्द

जड़ों से उखड़ना — एक और त्रासदी

1947 के विभाजन में किशन सिंह का गाँव बंगा पाकिस्तान में चला गया। वह ज़मीन जहाँ भगत सिंह ने जन्म लिया, जहाँ उनके पुरखे रहे — वह पाकिस्तान बन गई। किशन सिंह ने दो बड़े दर्द एक जीवन में झेले — बेटे की शहादत और जड़ों से उखड़ना। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

स्रोत: Jagmohan Singh & Chaman Lal (eds.), Bhagat Singh and His Times (Leftword Books, 2007)

विचारधारा — देशभक्ति का वह स्रोत

सरदार किशन सिंह की विचारधारा को समझना ज़रूरी है — क्योंकि यही वह मिट्टी थी जिसने भगत सिंह को गढ़ा।[6]

🇮🇳
गांधीवादी राष्ट्रवाद
कांग्रेस के सदस्य, अहिंसा और सत्याग्रह में विश्वास। गांधी जी के नेतृत्व में आज़ादी की लड़ाई।
🤝
सांप्रदायिक सद्भाव
हिंदू-मुस्लिम-सिख एकता में विश्वास। HSRA की तरह किशन सिंह भी सांप्रदायिक एकता के हिमायती थे।
👨‍👩‍👦
परिवार पहले देश
अपने बच्चों को देशभक्ति की शिक्षा दी। भगत सिंह की क्रांतिकारी राह को रोका नहीं।
💪
व्यक्तिगत बलिदान
जेल, पुत्र की शहादत, जड़ों से उखड़ना — सब कुछ सहा। कभी हार नहीं मानी।
📚
शिक्षा का महत्व
भगत सिंह को लाहौर नेशनल कॉलेज भेजा। शिक्षा को देशभक्ति का हिस्सा माना।
🌱
सिख मूल्य
गुरुद्वारे की सेवा, गुरु ग्रंथ साहिब की शिक्षाएँ — परिवार में सिख मूल्यों का पालन।

सरदार किशन सिंह — ऐतिहासिक टाइमलाइन

वर्ष / तिथि घटना
1879 जन्म: बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब। पिता सरदार अर्जुन सिंह। सिख जाट किसान परिवार।
~1900 विवाह: विद्यावती के साथ विवाह। एक ऐसी पत्नी जो बाद में शहीद-ए-आज़म की माँ बनेंगी।
1907 पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन: किशन सिंह के भाई अजीत सिंह ने इस किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। किशन सिंह भी गिरफ्तार हुए।
27 सितंबर 1907 भगत सिंह का जन्म: उसी दिन किशन सिंह जेल से रिहा हुए। दोहरी खुशी का वह ऐतिहासिक दिन।
1919 जलियाँवाला बाग हत्याकांड: 13 अप्रैल 1919। किशन सिंह ने अपने 12 वर्षीय बेटे भगत सिंह को इस हत्याकांड के बारे में बताया। भगत सिंह ने वहाँ की मिट्टी लाकर रखी।
1920–22 असहयोग आंदोलन: किशन सिंह कांग्रेस के साथ सक्रिय। ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार। भगत सिंह ने घर में यह सब देखा।
~1923–24 भगत सिंह की लाहौर शिक्षा: किशन सिंह ने भगत सिंह को लाहौर के नेशनल कॉलेज भेजा। यहाँ भगत सिंह HSRA से जुड़े।
1928 साइमन कमीशन विरोध और लाला लाजपत राय की मृत्यु: लाजपत राय की मृत्यु ने परिवार को और देश को झकझोर दिया।
17 दिसंबर 1928 साँडर्स वध: भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने लाहौर में John Saunders को मारा। किशन सिंह जानते थे — बेटा अब नहीं बचेगा।
8 अप्रैल 1929 केंद्रीय विधानसभा बम कांड: भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली विधानसभा में बम फेंका और गिरफ्तारी दी।
1929–1930 लाहौर षड्यंत्र केस: मुकदमे की सुनवाई। किशन सिंह ने petition दायर की — भगत सिंह के विरोध पर वापस ली।
23 मार्च 1931 भगत सिंह की शहादत: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी। किशन सिंह का सबसे बड़ा दर्द — और सबसे बड़ा गर्व।
1931–1947 स्वतंत्रता आंदोलन जारी: भगत सिंह की शहादत के बाद भी किशन सिंह स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन।
1947 भारत की आज़ादी और विभाजन: वह सपना पूरा हुआ। लेकिन जन्मस्थान बंगा पाकिस्तान में चला गया। एक और दर्द।
1962 निधन: भारत में। 83 वर्ष की आयु। भगत सिंह की शहादत के 31 वर्ष बाद। एक पूर्ण जीवन — दर्द से भरा, गर्व से भरा।

सरदार किशन सिंह की विरासत

सरदार किशन सिंह की विरासत को केवल “भगत सिंह के पिता” के रूप में देखना उनके साथ न्याय नहीं होगा। वे खुद एक स्वतंत्रता सेनानी थे, एक देशभक्त परिवार के स्तंभ थे।[6]

सरदार किशन सिंह की बहुआयामी विरासत
भगत सिंह के पिता
उस मिट्टी के रखवाले जिसने शहीद-ए-आज़म को जन्म दिया। परिवार में देशभक्ति की नींव।
स्वतंत्रता सेनानी
खुद कांग्रेस के कार्यकर्ता, कई बार जेल गए। भगत सिंह से पहले भी देशसेवा में लगे थे।
त्याग का प्रतीक
अपने बेटे की जान बचाने की जगह बेटे की इच्छा का सम्मान किया। यह सबसे बड़ा त्याग है।
अजीत सिंह का भाई
पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के नेता अजीत सिंह के भाई — परिवार की क्रांतिकारी परंपरा।
पंजाब की पहचान
वह पंजाबी जाट सिख परिवार जिसने भारत को उसका सबसे प्रिय शहीद दिया।
सरकारी मान्यता
स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भारत सरकार द्वारा मान्यता। हुसैनीवाला में भगत सिंह का समाधि स्थल।

सरदार किशन सिंह से जुड़े रोचक तथ्य

जन्म-रिहाई का संयोग: 27 सितंबर 1907 को जिस दिन भगत सिंह का जन्म हुआ, उसी दिन किशन सिंह जेल से रिहा हुए। परिवार ने इसे शुभ संयोग माना।
तीन भाई, तीन देशभक्त: किशन सिंह के तीन भाई थे — अजीत सिंह (क्रांतिकारी), स्वर्ण सिंह और किशन सिंह खुद। एक परिवार में इतनी देशभक्ति दुर्लभ थी।
Petition का विवाद: किशन सिंह ने भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए petition दायर की — लेकिन जब भगत सिंह को पता चला तो उन्होंने विरोध किया। किशन सिंह ने petition वापस ली। यह एक पिता की सबसे कठिन परीक्षा थी।
31 साल बाद निधन: किशन सिंह 23 मार्च 1931 को भगत सिंह की शहादत के 31 वर्ष बाद 1962 में निधन हुए। इन 31 वर्षों में उन्होंने स्वतंत्र भारत भी देखा और बेटे की याद भी जीते रहे।
विभाजन का दर्द: 1947 के विभाजन में किशन सिंह का जन्मस्थान बंगा पाकिस्तान में चला गया। अपनी जड़ों से उखड़ना — यह दर्द बेटे की शहादत के दर्द से कम नहीं था।
खेतों की मिट्टी से क्रांति तक: किशन सिंह एक साधारण जाट सिख किसान परिवार से थे। इसी साधारण परिवार ने भारत के सबसे असाधारण शहीद को जन्म दिया।
कांग्रेस और HSRA — दो रास्ते एक छत के नीचे: किशन सिंह कांग्रेस के थे, भगत सिंह HSRA के। एक ही घर में दो अलग-अलग रास्ते — लेकिन एक ही मंज़िल। यह परिवार की ताकत थी।
हुसैनीवाला स्मारक: जहाँ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का अंतिम संस्कार किया गया, वह हुसैनीवाला (अब पंजाब, भारत) आज एक राष्ट्रीय स्मारक है। किशन सिंह ने इस स्थान को भी देखा।

60 सेकंड में सरदार किशन सिंह

⏱ 60 सेकंड में सरदार किशन सिंह — Voice Assistant के लिए

सरदार किशन सिंह (1879–1962) शहीद भगत सिंह के पिता और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे।

वे पंजाब के बंगा, जिला लायलपुर (अब पाकिस्तान) में जन्मे थे। उनकी पत्नी विद्यावती थीं। उनके भाई सरदार अजीत सिंह पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन (1907) के नेता थे।

27 सितंबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ — उसी दिन किशन सिंह जेल से रिहा हुए थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे और कई बार जेल गए।

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई। किशन सिंह ने इस दर्द को सहा — लेकिन राष्ट्रसेवा नहीं छोड़ी। 1947 में भारत आज़ाद हुआ और 1962 में उनका निधन हुआ।

FAQ — सरदार किशन सिंह

Qसरदार किशन सिंह कौन थे?
सरदार किशन सिंह (1879–1962) शहीद भगत सिंह के पिता और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पंजाब के बंगा, जिला लायलपुर (अब पाकिस्तान) के थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य, कई बार जेल गए। उनके भाई अजीत सिंह एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे।
Qकिशन सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
सरदार किशन सिंह का जन्म 1879 में बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब में हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है।
Qभगत सिंह के पिता का नाम क्या था?
भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। वे पंजाब के बंगा, लायलपुर के थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे।
Qभगत सिंह की माँ का नाम क्या था?
भगत सिंह की माँ का नाम विद्यावती था। वे सरदार किशन सिंह की पत्नी थीं। विद्यावती ने अपने पति को जेल जाते और अपने बेटे को शहीद होते देखा — एक असाधारण माँ।
Qकिशन सिंह के भाई कौन थे?
सरदार किशन सिंह के दो भाई थे — सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह। सरदार अजीत सिंह 1907 के पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के नेता थे और एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे।
Qभगत सिंह का जन्म कब हुआ था?
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब में हुआ था। उसी दिन उनके पिता सरदार किशन सिंह जेल से रिहा हुए थे।
Qसरदार किशन सिंह किस संगठन से जुड़े थे?
सरदार किशन सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य और कार्यकर्ता थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन और अन्य कांग्रेस आंदोलनों में भाग लिया।
Qकिशन सिंह कितनी बार जेल गए?
सरदार किशन सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण कई बार गिरफ्तार और जेल में बंद हुए। पहली गिरफ्तारी 1907 में हुई — उसी वर्ष जब भगत सिंह का जन्म हुआ।
Qकिशन सिंह ने भगत सिंह की फाँसी रोकने की कोशिश की थी?
हाँ। सरदार किशन सिंह ने ब्रिटिश अधिकारियों को एक petition (अर्जी) दी थी। लेकिन जब भगत सिंह को पता चला, उन्होंने इसका विरोध किया — वे माफी माँगकर नहीं जीना चाहते थे। किशन सिंह ने अपने बेटे की इच्छा का सम्मान करते हुए petition वापस ली।
Qभगत सिंह की फाँसी के बाद किशन सिंह ने क्या किया?
23 मार्च 1931 को भगत सिंह की शहादत के बाद किशन सिंह ने स्वतंत्रता संघर्ष जारी रखा। वे भगत सिंह की विरासत को जीवित रखने में सक्रिय रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी भागीदारी की।
Qसरदार किशन सिंह की मृत्यु कब हुई?
सरदार किशन सिंह का निधन 1962 में हुआ। वे 83 वर्ष के थे। भगत सिंह की शहादत के 31 वर्ष बाद तक वे जीवित रहे।
Qकिशन सिंह और अजीत सिंह का क्या संबंध था?
सरदार अजीत सिंह सरदार किशन सिंह के भाई थे। अजीत सिंह 1907 के पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के नेता थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें देश से निर्वासित किया। वे भगत सिंह के चाचा थे और भगत सिंह के लिए एक प्रेरणास्रोत थे।
Qभगत सिंह के कितने भाई-बहन थे?
सरदार किशन सिंह और विद्यावती के कई बच्चे थे। भगत सिंह के भाइयों में स्वर्ण सिंह (जिनका बचपन में निधन हो गया), कुलतार सिंह और रणवीर सिंह प्रमुख हैं।
Qकिशन सिंह का भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों पर क्या रुख था?
किशन सिंह खुद कांग्रेस के अहिंसक मार्ग पर थे, जबकि भगत सिंह HSRA के सशस्त्र क्रांति के मार्ग पर थे। किशन सिंह ने भगत सिंह के रास्ते को नहीं रोका — क्योंकि दोनों का उद्देश्य एक था। मतभेद तरीके पर था, मंज़िल पर नहीं।
Qसरदार किशन सिंह की विरासत क्या है?
सरदार किशन सिंह की विरासत इस बात में है कि उन्होंने एक ऐसे परिवार की नींव रखी जिसने भारत को शहीद-ए-आज़म भगत सिंह दिया। वे खुद एक स्वतंत्रता सेनानी थे, अपने बेटे की शहादत का दर्द सहा और अंत तक राष्ट्रसेवा में लगे रहे।

निष्कर्ष — सरदार किशन सिंह: वह पिता जिसने शहीद को जन्म दिया

सरदार किशन सिंह की कहानी केवल “भगत सिंह के पिता” की कहानी नहीं है। यह उस परिवार की कहानी है जिसने पीढ़ियों से देशभक्ति को जिया — जहाँ पिता जेल गए, चाचा देश से निर्वासित हुए, और बेटे ने फाँसी का फंदा गले में डाला।

किशन सिंह ने जो त्याग किया वह असाधारण था। अपने बेटे की petition वापस लेना — यह दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक था। लेकिन उन्होंने किया — क्योंकि वे जानते थे कि भगत सिंह की शहादत एक व्यक्ति की मौत नहीं, एक विचार का जन्म है।

“भगत सिंह को समझना हो तो पहले किशन सिंह को समझो। वह मिट्टी, वह घर, वह परिवार — जहाँ से शहीद-ए-आज़म निकले — वहाँ की नींव किशन सिंह थे।”

— भगत सिंह के परिवार पर ऐतिहासिक मूल्यांकन

आज जब हम किशन सिंह की जीवनी पढ़ते हैं, तो हमें एहसास होता है कि महान व्यक्तित्व अकेले नहीं बनते — उनके पीछे एक पूरा परिवार होता है, एक पूरी परंपरा होती है। भगत सिंह के पीछे थे — सरदार किशन सिंह।

स्रोत एवं संदर्भ

  1. Kuldip Nayar, Without Fear: The Life and Trial of Bhagat Singh (HarperCollins India, 2007)
  2. Bipan Chandra, India’s Struggle for Independence (Penguin Books, New Delhi, 1989)
  3. Jagmohan Singh & Chaman Lal (eds.), Bhagat Singh and His Times (Leftword Books, New Delhi, 2007)
  4. A.G. Noorani, The Trial of Bhagat Singh: Politics of Justice (Oxford University Press, 1996)
  5. शिव वर्मा, Reminiscences of a Revolutionary (People’s Publishing House, New Delhi, 1995)
  6. Malwinder Jit Singh Waraich & Harish Jain (eds.), Bhagat Singh: Collected Works
  7. National Archives of India — Lahore Conspiracy Case Files; Punjab Government Records 1907, 1929–1931
  8. Bhagat Singh Centenary Volume (Punjab Government, 2007)
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अंतिम अपडेट: जून 2026 | स्रोत सत्यापन के बाद प्रकाशित | सरकारी एवं सार्वजनिक स्रोतों से जानकारी सत्यापित

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