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बीना दास की जीवनी (1911–1986): स्टेनली जैक्सन पर हमला, कारावास, स्वतंत्रता संग्राम और विरासत

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बीना दास जीवनी | Bina Das Biography in Hindi
जीवनी · 2026 संस्करण · तथ्य-सत्यापित

बीना दास

24 अगस्त 1911 — 26 दिसंबर 1986 · आयु 75 वर्ष
जन्म कृष्णनगर, नदिया, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत
निधन 26 दिसंबर 1986 · ऋषिकेश, उत्तराखंड
संगठन छात्री संघ · बंगाल वॉलंटियर्स · भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
सम्मान पद्मश्री (1960) · “अग्निकन्या”
ऐतिहासिक स्रोत सत्यापित अंतिम अपडेट: जून 2026 स्रोत: National Archives of India · Calcutta University Records · समकालीन समाचारपत्र
तथ्य-जाँच प्राथमिक स्रोत आधारित राजनीतिक तटस्थता मिथक-तथ्य विभाजित
बीना दास (1911–1986)
बीना दास (1911–1986)
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अग्रणी महिला क्रांतिकारी — “अग्निकन्या”

बीना दास कौन थीं?

बीना दास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन साहसी महिला क्रांतिकारियों में थीं जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के सर्वोच्च प्रतिनिधि पर सीधा हमला करने का साहस दिखाया। बंगाल के एक शिक्षित ब्राह्मो परिवार में जन्मी बीना दास कम उम्र में ही राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ गईं और छात्री संघ तथा बंगाल वॉलंटियर्स की सक्रिय सदस्य बनीं।

6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्होंने बंगाल के गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन पर गोली चलाई। यह कदम व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं बल्कि दशकों की पराधीनता के विरुद्ध एक युवा महिला का राजनीतिक विरोध था।

स्वतंत्रता के बाद भी वे राजनीति और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं। परंतु उनका अंतिम जीवन गुमनामी में बीता — यही उनकी कहानी को आज भी प्रासंगिक और मार्मिक बनाता है।

⏱️ 60 सेकंड में — बीना दास

बंगाल की क्रांतिकारी बीना दास ने 1932 में बंगाल के गवर्नर पर गोली चलाई, नौ वर्ष जेल में बिताए और गांधी के प्रयासों से 1939 में रिहा हुईं। भारत छोड़ो आंदोलन में फिर गिरफ्तार हुईं। स्वतंत्रता के बाद विधानसभा सदस्य रहीं, 1960 में पद्मश्री मिली। 1986 में ऋषिकेश में निधन — गुमनामी में।


⚡ त्वरित जीवन परिचय — Quick Facts
पूरा नामबीना दास
उपनाम“अग्निकन्या” (Agnikanya — Daughter of Fire)
जन्म24 अगस्त 1911, कृष्णनगर, नदिया जिला, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत
निधन26 दिसंबर 1986, ऋषिकेश, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) — आयु 75 वर्ष
पिताबेनी माधब दास — ब्राह्मो शिक्षक, रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल, कटक के हेडमास्टर
मातासरला देवी — समाजसेविका, पुण्य आश्रम (महिला छात्रावास) की संस्थापक
भाई-बहनपाँच बेटियों में सबसे छोटी; वरिष्ठ बहन कल्याणी दास (भट्टाचार्जी) — स्वयं क्रांतिकारी एवं छात्री संघ की सह-संस्थापक
शिक्षासेंट जॉन्स डायोसेसन गर्ल्स हाई स्कूल; बेथुन कॉलेज, कलकत्ता (अंग्रेज़ी ऑनर्स)
संगठनछात्री संघ; बंगाल वॉलंटियर्स; बंगाल क्रांतिकारी दल; बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
प्रमुख घटनागवर्नर स्टेनली जैक्सन पर हमला — 6 फरवरी 1932, सीनेट हाउस, कलकत्ता विश्वविद्यालय
रिवॉल्वर प्रदाताकमला दास गुप्ता (युगांतर दल)
गिरफ्तारी6 फरवरी 1932, घटनास्थल पर ही
सजानौ वर्ष सश्रम कारावास (IPC धारा 307)
रिहाई1939 (महात्मा गांधी के प्रयासों से)
द्वितीय कारावास1942–1945 (भारत छोड़ो आंदोलन में भागीदारी हेतु)
विवाहजतीश चंद्र भौमिक — युगांतर दल के क्रांतिकारी (विवाह वर्ष 1947)
राजनीतिक भूमिकाबंगाल विधान सभा सदस्य (1946–1951)
सम्मानपद्मश्री (1960, सामाजिक कार्य हेतु); मरणोपरांत स्नातक उपाधि, कलकत्ता विश्वविद्यालय (2012)
प्रमुख लेखनश्रृंखल झंकार (Shrinkhal Jhankar); पितृधन (Pitridhan) — दोनों बांग्ला आत्मकथात्मक रचनाएँ
प्रमुख साथीकल्याणी दास, सुहासिनी गांगुली, कमला दास गुप्ता, सुभाष चंद्र बोस

प्रमुख जीवन घटनाएँ (1911–1986)

1911
जन्म — 24 अगस्त, कृष्णनगर, नदिया जिला। पिता बेनी माधब दास, माता सरला देवी।
1910 के दशक
परिवार कटक में निवास — पिता रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल में हेडमास्टर, जहाँ सुभाष चंद्र बोस उनके शिष्य थे।
1928
बंगाल वॉलंटियर्स में शामिल। छात्री संघ की स्थापना — बहन कल्याणी दास सह-संस्थापक। बेथुन कॉलेज में अंग्रेज़ी ऑनर्स में प्रवेश।
1930
संगठन के सदस्यों द्वारा पुलिस आयुक्त टेगार्ट पर असफल हमले के बाद भारी दमन। बीना दास ने गवर्नर पर हमले का निर्णय लिया।
6 फरवरी 1932
कलकत्ता विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोह — गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन पर पाँच गोलियाँ चलाईं। हमला असफल। घटनास्थल पर गिरफ्तार। नौ वर्ष सश्रम कारावास की सजा।
1932–1939
मिदनापुर व अन्य जेलों में कारावास। भूख हड़ताल — सात दिन बाद प्रशासन को माँगें माननी पड़ीं।
1939
रिहाई — महात्मा गांधी के हस्तक्षेप से। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल। 1941 में दक्षिण कलकत्ता कांग्रेस इकाई की अध्यक्ष।
1942–1945
भारत छोड़ो आंदोलन — हाज़रा क्रॉसिंग सभा के लिए पुनः गिरफ्तार। प्रेसीडेंसी जेल में तीन वर्ष।
1946–1951
बंगाल/पश्चिम बंगाल विधान सभा की निर्वाचित सदस्य। 1947 में जतीश चंद्र भौमिक से विवाह।
1948–1960
आत्मकथा “श्रृंखल झंकार” का प्रकाशन। श्रमिक आंदोलन में सक्रियता। कांग्रेस से अलगाव। 1960 में पद्मश्री सम्मान।
1986
निधन — 26 दिसंबर, ऋषिकेश। पहचान में लगभग एक माह का समय लगा।
2012
कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा मरणोपरांत स्नातक उपाधि — 80 वर्ष बाद, जो ब्रिटिश सरकार ने रोक रखी थी।

जन्म और परिवार

बीना दास का जन्म 24 अगस्त 1911 को बंगाल प्रेसीडेंसी के नदिया जिले के कृष्णनगर में हुआ। वे अपने माता-पिता की पाँच बेटियों में सबसे छोटी थीं।

उनके पिता बेनी माधब दास कटक स्थित रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल के हेडमास्टर थे — एक प्रतिष्ठित ब्राह्मो शिक्षक और विद्वान। उनके सबसे प्रसिद्ध शिष्यों में सुभाष चंद्र बोस थे, जिन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने गुरु का उल्लेख किया है।

पिता और सुभाष चंद्र बोस

बेनी माधब दास के सबसे प्रसिद्ध शिष्य सुभाष चंद्र बोस थे। कहा जाता है कि जब बोस गुप्त रूप से देश छोड़ने वाले थे, तब उन्होंने अपने गुरु से आशीर्वाद लिया था। दर्शन, अर्थशास्त्र और इतिहास के अध्येता बेनी माधब दास को एक आदर्श देशभक्त शिक्षक के रूप में याद किया जाता है।

बीना दास की माता सरला देवी स्वयं एक सक्रिय समाजसेविका थीं। उन्होंने कलकत्ता में पुण्य आश्रम नामक महिला छात्रावास स्थापित किया, जहाँ क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ी युवतियाँ रहती थीं।

परिवार में क्रांतिकारी विरासत

बीना दास की ठीक ऊपर की बहन कल्याणी दास (1907–1983) स्वयं एक प्रमुख क्रांतिकारी थीं और 1928 में छात्री संघ की सह-संस्थापक बनीं। परिवार का पूरा वातावरण — ब्राह्मो मूल्य, स्वदेशी शिक्षा और राष्ट्रवादी चेतना — बीना दास के राजनीतिक विकास का आधार था।

ऐतिहासिक मतभेद — जन्मस्थान

अधिकांश प्रमाणिक स्रोत बीना दास का जन्मस्थान कृष्णनगर, नदिया जिला बताते हैं। कुछ लेख उन्हें “चटगांव की” बताते हैं — संभवतः परिवार के पैतृक संबंध के कारण। बचपन का एक हिस्सा कटक में बीता, जहाँ पिता कार्यरत थे। इस लेख में बहुसंख्य प्रमाणिक स्रोतों के अनुसार कृष्णनगर को जन्मस्थान माना गया है।

शिक्षा और बौद्धिक विकास

कलकत्ता आने के बाद बीना दास ने सेंट जॉन्स डायोसेसन गर्ल्स हाई स्कूल में स्कूली शिक्षा पूरी की। यहीं उनके भीतर राष्ट्रवादी विचारों ने जड़ें जमानी शुरू कीं।

विद्रोही स्वभाव का पहला संकेत

मैट्रिक परीक्षा में निबंध विवाद

मैट्रिकुलेशन परीक्षा में बीना दास ने शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रतिबंधित उपन्यास “पथेर दाबी” (1926) पर निबंध लिखा — जो भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने वाले एक गुप्त संगठन की कहानी है। इस विद्रोही चयन के कारण उनके अंक काटे गए। यह घटना उनके भीतर पल रही असहमति का प्रारंभिक प्रमाण था।

स्रोत: Live History India, “Bina Das: A Brave, Forgotten Daughter of Bengal” (28 अक्टूबर 2020)

उच्च शिक्षा के लिए बीना दास ने बेथुन कॉलेज, कलकत्ता में अंग्रेज़ी ऑनर्स में प्रवेश लिया। यह संस्थान उस दौर की कई महिला क्रांतिकारियों का केंद्र था — प्रीतिलता वड्डेदार और कल्पना दत्त भी यहाँ पढ़ी थीं।

यहीं बीना दास की मित्रता सहपाठी सुहासिनी गांगुली से हुई — जो स्वयं एक क्रांतिकारी थीं और जिन्होंने बाद में बीना दास का परिचय क्रांतिकारी संगठन से कराया।

1920–30 का बंगाल — क्रांतिकारी वातावरण

1920 और 1930 के दशक में बंगाल भारत के सबसे सक्रिय क्रांतिकारी केंद्रों में से एक था। गांधीवादी असहयोग आंदोलन के साथ-साथ सशस्त्र प्रतिरोध की एक समानांतर धारा भी प्रबल थी।

संगठनस्थापनाविचारधाराप्रमुख व्यक्ति
अनुशीलन समिति1902क्रांतिकारी राष्ट्रवादपुलिन बिहारी दास, बारींद्र घोष
युगांतर1906सशस्त्र क्रांतिकारी राष्ट्रवादबारींद्र कुमार घोष, कमला दास गुप्ता
बंगाल वॉलंटियर्स1928राष्ट्रवादी प्रशिक्षण संगठनसुभाष चंद्र बोस, हेमचंद्र घोष
छात्री संघसितंबर 1928महिला क्रांतिकारी प्रशिक्षणकल्याणी दास, सुरमा मित्रा, कमला दास गुप्ता
इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगांव)1930सशस्त्र स्वतंत्रता संग्रामसूर्य सेन, प्रीतिलता वड्डेदार, कल्पना दत्त

बंगाल की महिलाएँ इस दौर में पहली बार बड़ी संख्या में संगठित रूप से क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग ले रही थीं। छात्री संघ इसी प्रवृत्ति का प्रतिनिधि संगठन था।

बंगाल वॉलंटियर्स और क्रांतिकारी दल

1928 में बीना दास बंगाल वॉलंटियर्स में शामिल हुईं — एक राष्ट्रवादी संगठन जिसकी स्थापना सुभाष चंद्र बोस ने की थी। उसी वर्ष उनकी सहपाठी सुहासिनी गांगुली ने उनसे पूछा कि क्या वे मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए “कुछ वास्तविक” करना चाहती हैं। बीना दास के हाँ कहने पर सुहासिनी ने उन्हें बंगाल क्रांतिकारी दल से जोड़ा।

अत्यंत गोपनीय संगठन

यह संगठन इतना गोपनीय था कि सदस्य एक-दूसरे के वास्तविक नाम भी नहीं जानते थे। बीना दास को यह पता ही नहीं था कि अनुजा चरण सेन और दिनेश चंद्र मजूमदार भी इस समूह के सदस्य हैं — जब तक 25 अगस्त 1930 को इन दोनों ने पुलिस आयुक्त चार्ल्स टेगार्ट की हत्या का असफल प्रयास नहीं किया।

टेगार्ट हत्या प्रयास के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने भारी दमन शुरू किया और संगठन बिखर गया। इसी के बाद बीना दास ने एक नया लक्ष्य चुना — बंगाल के गवर्नर पर सीधा हमला।

छात्री संघ

Featured Snippet — छात्री संघ क्या था?

छात्री संघ (Girls’ Students’ Association) सितंबर 1928 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्थापित एक महिला छात्र संगठन था। इसकी स्थापना कल्याणी दास, सुरमा मित्रा और कमला दास गुप्ता ने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के संरक्षण में की। यह संगठन महिलाओं को साइकिल चलाना, लाठी-तलवार चालन और हथियार प्रशिक्षण देता था।

1928 की ऑल बंगाल स्टूडेंट्स एसोसिएशन बैठक में — जिसकी अध्यक्षता सुभाष चंद्र बोस ने की — छात्राओं ने पुरुषों के समान भूमिका की माँग रखी। परिणामस्वरूप सितंबर 1928 में छात्री संघ की स्थापना हुई, जिसमें सुरमा मित्रा अध्यक्ष और कल्याणी दास सचिव बनीं।

1928
सितंबर — छात्री संघ की स्थापना, कलकत्ता विश्वविद्यालय
100+
सदस्य — विभिन्न कलकत्ता संस्थानों से
5+
प्रमुख महिला क्रांतिकारी जिन्होंने यहाँ से प्रशिक्षण लिया

छात्री संघ ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कुछ सबसे प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारियों को आकार दिया — कल्पना दत्त (चटगांव शस्त्रागार कांड), प्रीतिलता वड्डेदार (पहारतली क्लब हमले में शहादत), शांति घोष और सुनीति चौधरी (कोमिल्ला जिला मजिस्ट्रेट की हत्या)। बीना दास इसी पीढ़ी की थीं।

गवर्नर पर हमले की तैयारी

संगठन के बिखर जाने और साथियों की गिरफ्तारी के बाद बीना दास ने एक नया साहसिक लक्ष्य चुना — बंगाल के गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन पर सीधा हमला।

हथियार के लिए उन्होंने युगांतर दल की क्रांतिकारी कमला दास गुप्ता से संपर्क किया। सहयोगी सुधीर घोष ने एक पुरानी बेल्जियन निर्मित, पाँच-कक्षीय रिवॉल्वर 280 रुपये में खरीदी।

कोई हथियार अभ्यास नहीं था

बीना दास को रिवॉल्वर चलाने का कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं था। जब उन्होंने यह चिंता कमला दास गुप्ता के सामने रखी, तो कमला ने कहा कि बेनॉय बसु ने भी राइटर्स बिल्डिंग हमले से पहले कोई अभ्यास नहीं किया था।

योजना का चुना हुआ अवसर था 6 फरवरी 1932 का दीक्षांत समारोह। संयोगवश, बीना दास स्वयं उस दिन अपनी स्नातक उपाधि लेने वाली छात्राओं में थीं — जिससे उन्हें बिना संदेह के समारोह में प्रवेश मिल गया। रिवॉल्वर स्नातक गाउन में छिपाकर ले जाने की योजना थी।

गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर हमला — 6 फरवरी 1932

Featured Snippet — 6 फरवरी 1932 को क्या हुआ?

कलकत्ता विश्वविद्यालय के सीनेट हाउस में आयोजित दीक्षांत समारोह में जब गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन भाषण दे रहे थे, बीना दास उठीं, मंच की ओर दौड़ीं और अपने गाउन में छिपाए रिवॉल्वर से गोलियाँ चला दीं। पाँच में से कोई गोली नहीं लगी। उपकुलपति हसन सुहरावर्दी ने उन्हें पकड़ लिया।

जैक्सन के भाषण के बीच ही बीना दास अपनी सीट से उठीं और मंच की ओर बढ़ीं। पहली गोली जैक्सन के कान के पास से गुज़री। जैक्सन ने तुरंत झुककर जान बचाई। मंच पर उनके साथ बैठे उपकुलपति लेफ्टिनेंट कर्नल हसन सुहरावर्दी उठकर बीना दास को रोकने का प्रयास करने लगे। इसके बावजूद बीना दास ने बाकी गोलियाँ भी चलाईं, परंतु ज़मीन पर गिराए जाने तक कोई भी गोली नहीं लगी।

  • स्थान: सीनेट हाउस, कलकत्ता विश्वविद्यालय, 6 फरवरी 1932
  • गोलियाँ: पाँच (विकिपीडिया एवं समकालीन समाचारपत्रों के अनुसार)
  • परिणाम: गवर्नर जैक्सन पूर्णतः सुरक्षित
  • निरस्त्रीकरण: हसन सुहरावर्दी द्वारा — जिन्हें इसके लिए नाइटहुड मिला
  • गिरफ्तारी: घटनास्थल पर तत्काल
क्रिकेटर गवर्नर की प्रतिक्रिया

गवर्नर जैक्सन इंग्लैंड के पूर्व टेस्ट कप्तान (1905) थे। हमले के बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए अपना भाषण फिर से शुरू कर दिया — उपस्थित जनसमूह ने तालियाँ बजाईं।

गिरफ्तारी के बाद

बीना दास को लालबाज़ार पुलिस मुख्यालय ले जाया गया। पुलिस ने उनके माता-पिता को बुलाकर दबाव बनाया कि यदि बीना दास रिवॉल्वर का स्रोत बता दें तो नरमी बरती जाएगी। परंतु दोनों टस से मस नहीं हुए।

“मेरे पिता ने देशद्रोही नहीं पाले।”

— बीना दास, अपने बंदीगृहकर्ताओं को उत्तर देते हुए (Live History India के अनुसार)
एक मानवीय क्षण

लालबाज़ार में भोजन

जब बीना दास ने भोजन माँगा, तो एक भारतीय हवालदार ने उनके लिए चावल, दाल, करी और नींबू सहित भोजन स्वयं बनाकर लाया। जब बीना दास ने आश्चर्य से देखा, तो उसने धीमे से कहा — “मैंने यह आपके लिए खुद बनाया है।”

स्रोत: बीना दास की आत्मकथा के अनुसार, उद्धृत — Live History India (2020)

मुकदमा और सजा

बीना दास के विरुद्ध मुकदमा एक विशेष न्यायाधिकरण में मात्र एक दिन में पूरा हुआ। उन्होंने अपना बयान स्वयं अंग्रेज़ी में पाँच पृष्ठों में लिखा।

इस बयान में उन्होंने लिखा कि उनका उद्देश्य उस दमनकारी व्यवस्था के विरुद्ध लड़ते हुए सम्मान से मरना था जिसने भारत को असीम पीड़ा में रखा था।

व्यक्तिगत द्वेष नहीं, वैचारिक विरोध

न्यायाधिकरण में बीना दास ने स्पष्ट किया कि गवर्नर जैक्सन के प्रति उनकी कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं थी। परंतु बंगाल का गवर्नर पद उस व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था जिसने तीस करोड़ भारतीयों को दशकों तक दासता में बाँध रखा था।

21
वर्ष — हमले के समय बीना दास की आयु
9
वर्ष सश्रम कारावास की सजा
1 दिन
मुकदमे की अवधि
307
IPC धारा — हत्या का प्रयास

जेल जीवन (1932–1939)

सजा के बाद बीना दास को मिदनापुर जेल सहित बंगाल की कई जेलों में रखा गया। जेल की दुर्व्यवस्था के विरुद्ध उन्होंने भूख हड़ताल की, जो सात दिनों तक चली और अंततः सफल रही — प्रशासन को उनकी माँगें माननी पड़ीं।

जेल में महिला क्रांतिकारियों का समुदाय

जेल में बीना दास का संपर्क अन्य महिला राजनीतिक बंदियों से हुआ, जिनमें कमला दास गुप्ता भी शामिल थीं। प्रेसीडेंसी जेल का महिला प्रकोष्ठ उस दौर की महिला क्रांतिकारियों के लिए वाद-विवाद और वैचारिक आदान-प्रदान का एक अनौपचारिक मंच बन गया था।

लगभग सात वर्षों के कारावास के बाद 1939 में महात्मा गांधी के व्यक्तिगत प्रयासों से बीना दास की रिहाई संभव हुई — अहिंसा के प्रतीक द्वारा एक सशस्त्र क्रांतिकारी की सहायता का उल्लेखनीय उदाहरण।

रिहाई और कांग्रेस में सक्रियता

1939 में जेल से रिहा होने के बाद बीना दास ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में कार्य करना शुरू किया — सशस्त्र क्रांतिकारी कार्रवाई से व्यापक जन-आधारित राजनीतिक आंदोलन की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव। 1941 में उन्हें कांग्रेस की दक्षिण कलकत्ता इकाई की अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

ऐतिहासिक मतभेद — वामपंथी झुकाव

बीना दास के राजनीतिक झुकाव को लेकर इतिहासकारों में भिन्नता है। विकिपीडिया के अनुसार वे कम्युनिस्ट पार्टी की औपचारिक सदस्य नहीं बनीं, परंतु समाजवादी और साम्यवादी विचारों से प्रभावित थीं। इस लेख में यही विवरण प्राथमिकता से प्रस्तुत किया गया है।

भारत छोड़ो आंदोलन और दूसरा कारावास

1942 में बीना दास ने दक्षिण कलकत्ता के हाज़रा क्रॉसिंग पर पुलिस निषेधाज्ञा के विरुद्ध सार्वजनिक सभा आयोजित की। जब एक हवलदार ने उनके सहयोगी पर डंडा चलाने का प्रयास किया, तो उन्होंने रोकने की कोशिश की — और इसी के लिए उन्हें पुनः गिरफ्तार कर प्रेसीडेंसी जेल भेजा गया। यह तीन वर्ष का दूसरा कारावास (1942–1945) था।

विवाह, विधान सभा और उत्तर-स्वतंत्रता संघर्ष

दूसरी बार रिहाई के बाद 1946 से 1951 तक बीना दास पश्चिम बंगाल विधान सभा की निर्वाचित सदस्य रहीं। 1947 में उन्होंने जतीश चंद्र भौमिक — युगांतर दल के क्रांतिकारी — से विवाह किया।

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विवाह — 1947
जतीश चंद्र भौमिक, युगांतर दल के क्रांतिकारी।
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विधान सभा — 1946–1951
पश्चिम बंगाल विधान सभा की निर्वाचित सदस्य।
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श्रमिक अधिकार
अमृत बाज़ार पत्रिका के श्रमिक संघ का समर्थन।
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पेंशन अस्वीकार
शरणार्थी नीति से असहमति में सरकारी पेंशन ठुकराई।

विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थियों को दूरस्थ दंडकारण्य भेजे जाने पर बीना दास और उनके पति दोनों ने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन अस्वीकार कर दी — सरकारी नीतियों से असहमति का प्रबल प्रमाण। इन्हीं मतभेदों के कारण उन्होंने अंततः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छोड़ दी।

साहित्यिक योगदान

बीना दास ने बांग्ला भाषा में दो आत्मकथात्मक रचनाएँ लिखीं।

श्रृंखल झंकार (Shrinkhal Jhankar)

उनकी प्रमुख रचना “श्रृंखल झंकार” (जंजीरों की झंकार) जेल जीवन और क्रांतिकारी अनुभवों का प्रत्यक्षदर्शी विवरण है। इसका प्रकाशन 1940 के दशक के अंत में हुआ — ठीक उस समय जब स्वतंत्र भारत में सशस्त्र क्रांतिकारियों की भूमिका को इतिहास-लेखन में गौण किया जा रहा था।

पितृधन (Pitridhan)

“पितृधन” (पिता की विरासत) उनके पारिवारिक जीवन और पिता बेनी माधब दास के मूल्यों पर केंद्रित दूसरी आत्मकथात्मक रचना है।

“आज भी मैं उनकी चीत्कार सुनती हूँ — भूखों का विलाप, निर्धनों की मौन पीड़ा। यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।”

— बीना दास, “श्रृंखल झंकार” से (अनुवादित अंश, Live History India के अनुसार)

इतिहासकार दुर्बा घोष ने Gender & History (2013) में बीना दास के लेखन और स्वतंत्र भारत में महिला क्रांतिकारियों की स्मृति-राजनीति पर शोधपत्र प्रकाशित किया है। उनका लेखन बंगाल की महिला क्रांतिकारियों के इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत बना हुआ है।

अंतिम वर्ष और निधन

बीना दास के जीवन के अंतिम दशक भारतीय इतिहास की सबसे विडंबनापूर्ण कहानियों में से एक हैं। जिस महिला ने 21 वर्ष की आयु में एक साम्राज्य को चुनौती दी, वह स्वतंत्र भारत में लगभग पूर्णतः भुला दी गई।

पति जतीश चंद्र भौमिक की मृत्यु के बाद उन्होंने स्वयं को एकांत में बंद कर लिया। कलकत्ता छोड़कर ऋषिकेश चली गईं जहाँ वे अत्यंत दरिद्रता में रहीं।

ऐतिहासिक मतभेद — निधन की परिस्थितियाँ

व्यापक विवरण (विकिपीडिया सहित अधिकांश स्रोत): 26 दिसंबर 1986 को उनका शव ऋषिकेश की सड़क किनारे अर्ध-विघटित अवस्था में मिला। पहचान में लगभग एक माह लगा।

वैकल्पिक विवरण (परिजनों के अनुसार, DD बांग्ला वृत्तचित्र 2021): उन्हें बस स्टैंड पर अचेत अवस्था में पाया गया, अस्पताल ले जाया गया जहाँ अगले दिन निधन हुआ। निधन तिथि दोनों में 26 दिसंबर 1986 मानी जाती है।

बहन कल्याणी दास का स्मरण

बीना दास की बहन कल्याणी दास (भट्टाचार्जी) का निधन 16 फरवरी 1983 को हुआ — बीना दास से लगभग तीन वर्ष पहले। कल्याणी ने अपनी आत्मकथा “जीबन अध्ययन” में दोनों के क्रांतिकारी जीवन का दस्तावेजीकरण किया, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद “A Study of Life” शीर्षक से उपलब्ध है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

बीना दास और उनकी समकालीन महिला क्रांतिकारियों ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाएँ केवल सहायक भूमिका तक सीमित नहीं थीं — वे संगठनकर्ता, योजनाकार और स्वयं कार्रवाई करने वाली कार्यकर्ता भी थीं।

महिला क्रांतिकारीसंगठनप्रमुख योगदानकाल
बीना दासछात्री संघ / बंगाल वॉलंटियर्सगवर्नर स्टेनली जैक्सन पर हमला (1932)1911–1986
प्रीतिलता वड्डेदारइंडियन रिपब्लिकन आर्मीपहारतली क्लब हमले का नेतृत्व, शहादत1911–1932
कल्पना दत्तइंडियन रिपब्लिकन आर्मी / CPIचटगांव शस्त्रागार कांड, भूमिगत क्रांति1913–1995
कल्याणी दासछात्री संघ (सह-संस्थापक)संगठन निर्माण, क्रांतिकारी नेतृत्व1907–1983
सुनीति चौधरीछात्री संघ (कोमिल्ला शाखा)जिला मजिस्ट्रेट स्टीवंस की हत्या (1931)1917–1988
कमला दास गुप्तायुगांतर दलबम वाहक, बीना दास को रिवॉल्वर की व्यवस्था1907–1995 (अनुमानित)

बीना दास के जीवन से जुड़े प्रमुख लोग

  • बेनी माधब दास (1866–1952) — पिता, ब्राह्मो शिक्षक, रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल के हेडमास्टर। सुभाष चंद्र बोस के गुरु।
  • सरला देवी — माता, समाजसेविका, “पुण्य आश्रम” की संस्थापक।
  • कल्याणी दास (भट्टाचार्जी) (1907–1983) — वरिष्ठ बहन, छात्री संघ की सह-संस्थापक, “जीबन अध्ययन” की लेखिका।
  • सुभाष चंद्र बोस (1897–1945) — बंगाल वॉलंटियर्स के संस्थापक, बेनी माधब दास के शिष्य, बीना दास और अनेक महिला क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत।
  • सुहासिनी गांगुली — बेथुन कॉलेज की सहपाठी एवं मित्र, जिन्होंने बीना दास को क्रांतिकारी दल से परिचित कराया।
  • कमला दास गुप्ता — युगांतर दल की क्रांतिकारी, जिन्होंने रिवॉल्वर की व्यवस्था की। बाद में जेल में साथी बंदी।
  • सर स्टेनली जैक्सन (1870–1947) — बंगाल के गवर्नर (1927–1932), हमले का लक्ष्य। पूर्व इंग्लैंड टेस्ट कप्तान।
  • हसन सुहरावर्दी — कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति, जिन्होंने बीना दास को पकड़ा। इसके लिए नाइटहुड प्राप्त हुआ।
  • जतीश चंद्र भौमिक — युगांतर दल के क्रांतिकारी, 1947 में पति। उनकी मृत्यु के बाद बीना दास ने एकांतवास ग्रहण किया।
  • महात्मा गांधी (1869–1948) — जिनके प्रयासों से 1939 में बीना दास की रिहाई संभव हुई।

विरासत

विरासत के प्रमुख आयाम
ऐतिहासिक महत्व
ब्रिटिश गवर्नर पर सीधा हमला करने वाली विरल महिला क्रांतिकारियों में से एक।
साहित्यिक विरासत
“श्रृंखल झंकार” व “पितृधन” — महिला क्रांतिकारी साहित्य के प्रारंभिक उदाहरण।
लोकतांत्रिक योगदान
विधान सभा सदस्य; श्रमिक एवं शरणार्थी अधिकारों हेतु संघर्ष।
मरणोपरांत सम्मान
2012 में कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा 80 वर्ष बाद स्नातक उपाधि।
महिला सशक्तिकरण
यह सिद्ध करने वाली कि महिलाएँ सशस्त्र प्रतिरोध में नेतृत्व दे सकती हैं।
उपेक्षा का प्रतीक
स्वतंत्र भारत में क्रांतिकारी महिलाओं की उपेक्षा का एक मार्मिक उदाहरण।

2012 में कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा बीना दास और प्रीतिलता वड्डेदार को मरणोपरांत स्नातक उपाधि — जो 1932 में ब्रिटिश सरकार ने रोक रखी थी — इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का एक प्रतीकात्मक प्रयास था।

2020–21 के आसपास डिजिटल मीडिया और DD बांग्ला वृत्तचित्र ने बीना दास की कहानी को पुनः जनचेतना में लाया है। इतिहासकार दुर्बा घोष के शोध ने भी उनके जीवन और स्मृति-राजनीति पर गंभीर अकादमिक ध्यान आकर्षित किया है।


मिथक बनाम सच्चाई

मिथक 1: बीना दास ने गवर्नर स्टेनली जैक्सन को मार दिया था।
ऐतिहासिक सत्य: हमला असफल रहा। पाँचों गोलियाँ जैक्सन को नहीं लगीं। वे सुरक्षित रहे और उसी दिन भाषण पूरा किया।
मिथक 2: बीना दास और प्रीतिलता वड्डेदार एक ही व्यक्ति थीं।
ऐतिहासिक सत्य: दोनों अलग-अलग महिला क्रांतिकारी थीं। बीना दास ने 1932 में बंगाल के गवर्नर पर हमला किया, जबकि प्रीतिलता वड्डेदार ने पहारतली यूरोपियन क्लब पर अभियान का नेतृत्व किया।
मिथक 3: बीना दास को फाँसी की सजा हुई थी।
ऐतिहासिक सत्य: उन्हें नौ वर्ष का सश्रम कारावास मिला, फाँसी नहीं।
मिथक 4: बीना दास छात्री संघ की संस्थापक थीं।
ऐतिहासिक सत्य: छात्री संघ की प्रमुख संस्थापक उनकी बड़ी बहन कल्याणी दास थीं। बीना दास सक्रिय सदस्य थीं।
मिथक 5: बीना दास का जन्म कलकत्ता में हुआ था।
ऐतिहासिक सत्य: जन्म 24 अगस्त 1911 को कृष्णनगर, नदिया में हुआ। बाद में परिवार कटक और फिर कलकत्ता गया।
मिथक 6: बीना दास ने अपने कार्य पर पश्चाताप किया था।
ऐतिहासिक सत्य: न्यायालय में उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें कोई पश्चाताप नहीं और यह राष्ट्रहित में किया।
मिथक 7: बीना दास का परिवार स्वतंत्रता आंदोलन से दूर था।
ऐतिहासिक सत्य: पिता बेनी माधब दास, माता सरला देवी और बहन कल्याणी दास — पूरा परिवार राष्ट्रवादी गतिविधियों से जुड़ा था।
मिथक 8: बीना दास का जीवन स्वतंत्रता के बाद सुखद रहा।
ऐतिहासिक सत्य: पद्मश्री मिलने के बावजूद अंतिम जीवन आर्थिक कठिनाइयों और गुमनामी में बीता।
मिथक 9: बीना दास केवल एक बार जेल गई थीं।
ऐतिहासिक सत्य: 1932 और 1942 — दो बार जेल गईं। कुल मिलाकर लगभग दस वर्ष कारावास में बिताए।
मिथक 10: बीना दास को कभी कोई सरकारी सम्मान नहीं मिला।
ऐतिहासिक सत्य: 1960 में पद्मश्री तथा 2012 में कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा मरणोपरांत स्नातक उपाधि प्राप्त हुई।


50 संवादात्मक प्रश्न और उत्तर

Qबीना दास कौन थीं?
बीना दास (1911–1986) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख महिला क्रांतिकारी थीं, जिन्होंने 1932 में बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर हमला किया था।
Qबीना दास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 24 अगस्त 1911 को कृष्णनगर, नदिया जिला, बंगाल प्रेसीडेंसी (वर्तमान पश्चिम बंगाल) में हुआ था।
Qबीना दास के माता-पिता कौन थे?
उनके पिता बेनी माधब दास रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल, कटक के हेडमास्टर और सुभाष चंद्र बोस के शिक्षक थे। माता सरला देवी समाजसेविका थीं।
Qबीना दास की बहन कौन थीं?
उनकी बड़ी बहन कल्याणी दास (भट्टाचार्जी) प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी और छात्री संघ की सह-संस्थापक थीं।
Qबीना दास ने कहाँ पढ़ाई की?
उन्होंने सेंट जॉन्स डायोसेसन गर्ल्स हाई स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में बेथुन कॉलेज, कलकत्ता से अंग्रेज़ी ऑनर्स की पढ़ाई की।
Qबीना दास किस संगठन से जुड़ी थीं?
वे छात्री संघ (Chhatri Sangha) और बंगाल वॉलंटियर्स जैसे राष्ट्रवादी एवं क्रांतिकारी संगठनों से जुड़ी थीं। उनका संपर्क युगांतर दल के क्रांतिकारियों से भी था।
Qछात्री संघ क्या था और इसकी स्थापना किसने की?
छात्री संघ 1928 में कलकत्ता में स्थापित एक प्रमुख महिला छात्र संगठन था। इसकी स्थापना सितंबर 1928 में कल्याणी दास, सुरमा मित्रा, कमला दास गुप्ता और अन्य सहयोगियों ने मिलकर की थी। इसका उद्देश्य युवतियों में राष्ट्रीय चेतना विकसित करना और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के लिए तैयार करना था।
Qबीना दास ने स्टेनली जैक्सन पर हमला कब और कहाँ किया था?
यह हमला 6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के सीनेट हाउस में आयोजित दीक्षांत समारोह के दौरान हुआ, जहाँ बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन मुख्य अतिथि थे।
Qबीना दास ने स्टेनली जैक्सन पर हमला क्यों किया?
अपने न्यायालयीय बयान में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी व्यक्ति से निजी दुश्मनी नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध वैचारिक और राजनीतिक विरोध का प्रतीकात्मक कदम था।
Qहमले में स्टेनली जैक्सन को कितनी गोलियाँ लगीं?
बीना दास ने पाँच गोलियाँ चलाईं, लेकिन कोई भी गोली स्टेनली जैक्सन को नहीं लगी और वे सुरक्षित बच गए।
Qबीना दास को रिवॉल्वर किसने दिया था?
युगांतर दल की क्रांतिकारी कमला दास गुप्ता ने रिवॉल्वर की व्यवस्था करवाई, जिसे सुधीर घोष ने लगभग 280 रुपये में खरीदा था।
Qहमले के बाद बीना दास को किसने पकड़ा?
हमले के तुरंत बाद लेफ्टिनेंट कर्नल हसन सुहरावर्दी ने उन्हें पकड़ा। उस समय वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे।
Qबीना दास पर कौन-सी IPC धारा लगाई गई थी?
उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मुकदमा चलाया गया था।
Qबीना दास को कितने वर्ष की सजा हुई थी?
उन्हें नौ वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी।
Qबीना दास ने अदालत में क्या बयान दिया था?
उन्होंने अपने कार्य की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए कहा कि उनका लक्ष्य किसी व्यक्ति से घृणा नहीं, बल्कि उस औपनिवेशिक शासन का विरोध था जो भारत की स्वतंत्रता का दमन कर रहा था। उन्होंने भागने या अपराध छिपाने की कोशिश नहीं की।
Qबीना दास को जेल से कब रिहाई मिली?
वे 1939 में अन्य राजनीतिक बंदियों के साथ रिहा हुईं। उनकी रिहाई में महात्मा गांधी के प्रयासों की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
Qबीना दास को 1942 में दोबारा क्यों गिरफ्तार किया गया?
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हाज़रा क्रॉसिंग पर निषेधाज्ञा का उल्लंघन कर सभा आयोजित करने और ब्रिटिश प्रशासन का विरोध करने के कारण उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया।
Qस्टेनली जैक्सन कौन थे?
वे इंग्लैंड के पूर्व टेस्ट क्रिकेट कप्तान थे और 1927 से 1932 तक बंगाल के गवर्नर रहे।
Qसुभाष चंद्र बोस का बीना दास परिवार से क्या संबंध था?
सुभाष चंद्र बोस, उनके पिता बेनी माधब दास के छात्र थे। इसी कारण दोनों परिवारों के बीच वैचारिक और ऐतिहासिक संबंध रहा।
Qबीना दास ने स्वतंत्रता के बाद राजनीति में क्या भूमिका निभाई?
स्वतंत्रता के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ीं और 1946 से 1951 तक बंगाल विधान सभा की सदस्य रहीं।
Qक्या बीना दास कभी सांसद बनीं?
नहीं। वे संसद सदस्य नहीं बनीं, लेकिन 1946 से 1951 तक बंगाल विधान सभा की सदस्य रहीं।
Qबीना दास ने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन क्यों अस्वीकार की?
उन्होंने और उनके पति ने विभाजन के बाद शरणार्थियों के साथ हुए अन्याय के विरोध में स्वतंत्रता सेनानी पेंशन स्वीकार नहीं की।
Qबीना दास को पद्मश्री कब और किस क्षेत्र में मिला?
उन्हें 1960 में सामाजिक कार्य के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया।
Q2012 में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने बीना दास को क्या सम्मान दिया?
2012 में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उन्हें तथा प्रीतिलता वड्डेदार को मरणोपरांत स्नातक उपाधि प्रदान की, जो 1932 में उनकी गिरफ्तारी के कारण रोक दी गई थी।
Qबीना दास ने किससे विवाह किया?
उन्होंने 1947 में युगांतर दल के क्रांतिकारी जतीश चंद्र भौमिक से विवाह किया।
Qबीना दास की मृत्यु कब और कहाँ हुई?
उनका निधन 26 दिसंबर 1986 को ऋषिकेश, उत्तराखंड में हुआ। जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने अत्यंत सादगी और गुमनामी में बिताए।
Qबीना दास की मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर क्या विवाद है?
कुछ स्रोतों में सड़क किनारे शव मिलने का उल्लेख है, जबकि अन्य विवरणों के अनुसार वे बस स्टैंड पर अचेत मिलीं और बाद में अस्पताल में उनका निधन हुआ। उनके अंतिम वर्ष आर्थिक कठिनाइयों और उपेक्षा में बीते।
Qबीना दास की प्रमुख पुस्तकें कौन-सी हैं?
उनकी प्रमुख आत्मकथात्मक रचनाएँ ‘श्रृंखल झंकार’ और ‘पितृधन’ हैं, जो उनके जीवन, परिवार और क्रांतिकारी अनुभवों का वर्णन करती हैं।
Qबीना दास की पुस्तक ‘श्रृंखल झंकार’ किस बारे में है?
यह उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक है जिसमें उन्होंने अपने क्रांतिकारी जीवन, स्टेनली जैक्सन पर हमले, जेल जीवन और स्वतंत्रता संग्राम के अनुभवों का विस्तृत वर्णन किया है।
Qबीना दास को ‘अग्निकन्या’ क्यों कहा जाता है?
उनके अदम्य साहस, निर्भीक क्रांतिकारी कार्यों और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ऐतिहासिक संघर्ष के कारण उन्हें ‘अग्निकन्या’ (Daughter of Fire) कहा जाता है।
Qबीना दास और प्रीतिलता वड्डेदार में क्या अंतर है?
दोनों स्वतंत्रता संग्राम की प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी थीं। प्रीतिलता वड्डेदार ने चटगाँव के पाहाड़तली यूरोपियन क्लब पर हमला किया और वहीं शहीद हुईं, जबकि बीना दास ने कलकत्ता में बंगाल के गवर्नर पर हमला किया और बाद में राजनीति व सामाजिक जीवन में भी सक्रिय रहीं।
Qबीना दास किस विचारधारा से प्रभावित थीं और क्या वे गांधीवादी थीं?
वे राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता और औपनिवेशिक शासन के विरोध की विचारधारा से प्रेरित थीं। प्रारंभ में उन्होंने सशस्त्र क्रांतिकारी मार्ग अपनाया, लेकिन बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़कर लोकतांत्रिक राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
Qक्या बीना दास का संबंध युगांतर दल से था?
हाँ। उनका संपर्क युगांतर दल के कई क्रांतिकारियों से था और उसी नेटवर्क के माध्यम से उन्हें हमले के लिए हथियार उपलब्ध कराया गया था।
Qबीना दास को स्वतंत्र भारत में कितना सम्मान मिला?
उन्हें 1960 में पद्मश्री मिला और 2012 में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने मरणोपरांत स्नातक उपाधि दी। हालाँकि कई इतिहासकार मानते हैं कि उनके योगदान की तुलना में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित सार्वजनिक पहचान नहीं मिल सकी।
Qक्या बीना दास का नाम स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल है?
कुछ राज्य बोर्डों और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में उनका उल्लेख मिलता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनका जीवन अपेक्षाकृत कम पढ़ाया जाता है।
Qक्या बीना दास का नाम UPSC और प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाता है?
हाँ। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, महिला क्रांतिकारियों और बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े प्रश्नों में उनका उल्लेख किया जाता है।
Qबीना दास के बारे में सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
कई लोग उन्हें कल्पना दत्त या अन्य महिला क्रांतिकारियों के साथ भ्रमित कर देते हैं, जबकि उनका जीवन, कार्यक्षेत्र और योगदान अलग था।
Qबीना दास का नाम किन प्रमुख महिला क्रांतिकारियों के साथ लिया जाता है?
प्रीतिलता वड्डेदार, कल्पना दत्त, दुर्गा भाभी (दुर्गा देवी वोहरा), कल्याणी दास और कमला दास गुप्ता के साथ।
Qबीना दास और भगत सिंह के विचारों में क्या समानता थी?
दोनों ब्रिटिश शासन का विरोध करते थे और भारत की स्वतंत्रता को सर्वोच्च लक्ष्य मानते थे। दोनों ने प्रतीकात्मक कार्रवाइयों के ज़रिए सार्वजनिक ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की, हालाँकि उनके कार्यक्षेत्र और परिस्थितियाँ अलग थीं।
Qक्या बीना दास और नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक-दूसरे को जानते थे?
हाँ। उनके पिता बेनी माधब दास, सुभाष चंद्र बोस के शिक्षक थे, इसलिए दोनों परिवारों के बीच ऐतिहासिक संबंध था।
Qक्या बीना दास की घटना को विदेशी समाचारपत्रों ने कवर किया था?
हाँ। उस समय के कई ब्रिटिश और अंतरराष्ट्रीय समाचारपत्रों ने इस घटना और उनके मुकदमे की रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
Qक्या बीना दास पर कोई वृत्तचित्र बना है?
हाँ। उनके जीवन और योगदान पर वृत्तचित्र तथा टेलीविजन कार्यक्रम बनाए जा चुके हैं।
Qक्या बीना दास पर शोध के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध हैं?
हाँ। उनकी आत्मकथाएँ, न्यायालयीय अभिलेख, समकालीन समाचारपत्र, विश्वविद्यालय रिकॉर्ड और आधुनिक इतिहासकारों के शोध विश्वसनीय स्रोत उपलब्ध कराते हैं।
Qबीना दास किस राज्य से संबंधित थीं?
उनका जन्म बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था, जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल का हिस्सा है।
Qबीना दास के जीवन की सबसे कठिन अवधि कौन-सी थी?
लंबा कारावास, स्वतंत्रता के बाद का संघर्ष और अंतिम वर्षों का एकाकी जीवन उनके सबसे कठिन दौर माने जाते हैं। पति के निधन के बाद वे आर्थिक कठिनाइयों और उपेक्षा में रहीं।
Qक्या बीना दास ने कभी भारत छोड़ा था?
उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार उन्होंने अपना अधिकांश जीवन भारत में ही बिताया।
Qक्या बीना दास को ‘भारत की पहली महिला क्रांतिकारी’ कहा जा सकता है?
नहीं। उनसे पहले भी कई महिला स्वतंत्रता सेनानियाँ सक्रिय थीं, लेकिन वे 1930 के दशक की सबसे प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारियों में अवश्य शामिल हैं।
Qक्या बीना दास ने कभी अपने निर्णय पर पछतावा व्यक्त किया?
ऐसा कोई विश्वसनीय ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। उन्होंने अपने कार्य को राष्ट्रीय कर्तव्य और राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत किया था।
Qक्या बीना दास का कोई आधिकारिक स्मारक है?
विभिन्न संस्थानों और शोध कार्यों में उनका उल्लेख मिलता है, हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर बड़े स्मारक सीमित हैं।
Qबीना दास का जीवन भारतीय इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण है?
उन्होंने ऐसे समय में साहस और नेतृत्व का परिचय दिया जब सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी सीमित थी। उनका जीवन महिला क्रांतिकारी भागीदारी, राजनीतिक प्रतिरोध और स्वतंत्रता संग्राम में बंगाल की भूमिका का एक प्रमाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।

प्रमाणिक पुस्तकें, इतिहासकार और संदर्भ

बीना दास की प्रमुख रचनाएँ

  • ‘श्रृंखल झंकार’ (Shrinkhal Jhankar) — उनकी सबसे प्रसिद्ध आत्मकथात्मक कृति, जिसमें क्रांतिकारी जीवन, स्टेनली जैक्सन पर हमला, जेल के अनुभव और वैचारिक संघर्ष का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद धीरा धर ने किया, जिसे ज़ुबान बुक्स ने प्रकाशित किया।
  • ‘पितृधन’ (Pitridhan) — पारिवारिक जीवन, पिता बेनी माधब दास और व्यक्तिगत स्मृतियों पर आधारित आत्मकथात्मक पुस्तक।

संबंधित पारिवारिक स्रोत

  • कल्याणी दास भट्टाचार्जी — “जीबन अध्ययन” (A Study of Life) — उनकी बड़ी बहन का संस्मरण, जिसमें दोनों बहनों के क्रांतिकारी जीवन और जेल अनुभवों का उल्लेख मिलता है।
  • कल्याणी दास भट्टाचार्जी (संपादक) — “Bengal Speaks” (1944) — बंगाल के स्वतंत्रता आंदोलन और महिला क्रांतिकारियों पर आधारित महत्वपूर्ण संकलन, जिसे बीना दास को समर्पित किया गया।

प्रमुख अकादमिक एवं शोध स्रोत

  • Durba Ghosh — Revolutionary Women and Nationalist Heroes in Bengal, 1930–1980s (2013) — बंगाल की महिला क्रांतिकारियों, स्मृति-राजनीति और बीना दास के ऐतिहासिक योगदान का विस्तृत अकादमिक विश्लेषण।
  • Radha Kumar — The History of Doing (1997) — भारत में महिला अधिकार आंदोलन का इतिहास, जिसमें कमला दास गुप्ता और बीना दास सहित अनेक महिला स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख है।
  • Dipanjan Ghosh — Bina Das: A Brave, Forgotten Daughter of Bengal (2020) — समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित विस्तृत जीवनी लेख।

महत्वपूर्ण अभिलेखागार एवं संग्रहालय

  • National Archives of India, New Delhi — भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज़।
  • West Bengal State Archives, Kolkata — बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन और प्रशासनिक अभिलेख।
  • कलकत्ता विश्वविद्यालय अभिलेख — 1932 के दीक्षांत समारोह और 2012 में प्रदान की गई मरणोपरांत उपाधि से जुड़े रिकॉर्ड।
  • British Library – India Office Records, London — 1930–1933 के बंगाल राजनीतिक अभिलेख और प्रशासनिक फाइलें।
  • समकालीन समाचारपत्र अभिलेख — Glasgow Herald, Reading Eagle, The Statesman, Indian Express तथा अन्य ऐतिहासिक समाचार स्रोत।
  • Ministry of Home Affairs, Government of India — पद्म पुरस्कारों और राष्ट्रीय सम्मान से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड।
अनुशंसित आगे का पठन

बीना दास के जीवन और उनके ऐतिहासिक संदर्भ को बेहतर समझने के लिए प्रीतिलता वड्डेदार, कल्पना दत्त, कमला दास गुप्ता तथा कल्याणी दास की जीवनियाँ भी पढ़ें। ये सभी बंगाल के महिला क्रांतिकारी आंदोलन की महत्वपूर्ण हस्तियाँ थीं और कई घटनाओं तथा संगठनों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं।

स्रोत एवं संदर्भ

✓ संपादकीय नोट एवं अस्वीकरण

यह जीवनी उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों, सरकारी दस्तावेज़ों, समकालीन समाचारपत्रों, विश्वसनीय पुस्तकों तथा प्रतिष्ठित इतिहासकारों के शोध के आधार पर तैयार की गई है। जहाँ विभिन्न स्रोतों में मतभेद मिलता है, वहाँ संतुलित एवं तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत की गई है।

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अंतिम अपडेट: जून 2026 | स्रोत सत्यापन के बाद प्रकाशित | सरकारी, अकादमिक एवं सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर जानकारी सत्यापित

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